डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’

(पूर्णिका’  के जनक साहित्याचार्य एडवोकेट डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’)

☆ एक पूर्णिका – सेवा करना अच्छा लगता है☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆

माँ तो आखिर माँ है उसको कैसा लगता है

साठ साल का बेटा है पर बच्चा लगता है

 *

कितना भी ऊधम करता हो, हो कितना भी उत्पाती

बाप को लेकिन अपना बेटा सच्चा लगता है।

 *

बेटी और बहिन की शादी में देते हैं धन खूब

जब सुसराल में दुख पाती तो धक्का लगता हैं

 *

गैरों का दुख देख दुखी हो जाता हूँ मैं अक्सर

क्योंकि मुझको सेवा करना अच्छा लगता है

 *

मंहगाई में अच्छा खाना न मिलने का आलम

आज जवानी में नाती भी बब्बा लगता है

 *

पापा हरदम बोला करते देव तुल्य है भैइया

लेकिन मुझको शैतानों सा चच्चा लगता है।

 *

पत्नी अच्छी मिल जाये तो जीवन का क्या कहना

प्रेमतभी जीना भी हमको अच्छा लगता है।

© डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’

पूर्णिका जनक, साहित्याचार्य एडवोकेट

संपर्क – 2451, आदर्श भवन, अनुराग मार्ग, गांधीनगर, न्यू कंचनपुर, अधारताल, जबलपुर (म.प्र.) पिन – 482004

मो. – 9302189724, 09300128144, ई-मेल: salapnathyadav@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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