श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा।)
यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – भाग-६ – गंगासागर से कलकत्ता ☆ श्री सुरेश पटवा
आज 17 जून 2023 को वापसी यात्रा आरम्भ होना है। जिस ऑटो से आए थे। उसके चालक का फ़ोन नंबर ले लिया था। उसे फ़ोन किया तो नौ बजे होटल के दरवाज़े पर ऑटो आ खड़ा हुआ। गंगा सागर से काचुबेरिया जेट्टी तक 32 किलोमीटर फिर वही नज़ारा, हर घर के सामने घनी हरियाली की गोद में एक पोखर, मुर्गियाँ, बदक और बकरियों के झुंड। ममता दीदी ने लड़कियों को साइकिल दी है। वे साइकिलों पर सरपट स्कूल जा रही हैं। दूध वाले, सब्ज़ी वाले और अख़बार के हाकर पसीना बहा रहे हैं। ऑटो जेट्टी की तरफ़ भाग रहे हैं। दस बजने को पाँच मिनट पहले जेट्टी पहुँचे। फेरी रवाना होने को तैयार थी। फटाफट टिकट लिए और फेरी में सवार हुए ही थे कि वह चल दी। चालीस मिनट में कॉकद्वीप पहुँच कर टैक्सी से कोलकाता रवाना होना है। जेट्टी में बढ़वानी जिले से तीर्थ भ्रमण योजना अन्तर्गत छत्तीस लोगों का एक समूह है। उनके बीच पाकर लगा कि महेश्वर में नर्मदा पार कर रहे हैं। आज धूप नहीं है। आसमान बादलों से मढ़ा है। ठंडी हवा बह रही है। सामने मस्त लहरों का मनमोहक लास्य है। फेरी में बैठते ही एक लड़का एकतारा पर गाने लगा।
सुन मेरे बंधु रे””””””””””
सुन मेरे मितवा “”””””””
सुन मेरे सा ॰॰॰॰॰॰॰॰थी रे
सचिन बर्मन की आवाज़ कानो में गूँजने लगी।
गीत को गुनगुनाते-गुनगुनाते ………गाने लगे। जब लय मिल गई तो लम्बी तान खींची””””” सुन मेरे बंधु रे”””””””””” सुन मेरे मितवा “” सुन मेरे सा ……थी रे”””” फिर पूरा गाना गाया। नाव में मौजूद यात्रियों ने देर तक तालियाँ बज़ाईं। मुखड़े से अंतरे पर उतरे। थोड़ा लड़खड़ा कर संभल गए। फिर तो ब्रह्मरांध्र से आनंद अमृत रिसने लगा।
होता तू पीपल, मैं होती अमर लता तेरी
तेरे गले माला बन के पड़ी मुस्काती रे
सुन मेरे सा ……थी रे””””
जिया कहे तू सागर, मैं होती तेरी नदिया
लहर बहर करती, अपने पिया से मिल जाती रे
सुन मेरे सा ……थी रे””””
आप अगर इस गीत का आनंद लेना चाहते हैं तो मोबाईल पर इस गीत को सुन कर आगे बढ़िए। टेक्नोलॉजी ने क्या ग़ज़ब किया, मुट्ठी में आनंद थमा दिया। इस गीत में प्रेमिका की जगह अपनी “आत्मा” को रखिए और पिया की जगह “परब्रह्म” को। इसे फिर से सुनिए। मौत हसीना लगने लगेगी। इसके पहले की महबूबा की आहट आए, कॉकद्वीप जेट्टी आ गया। जेट्टी (jetty) ऐसे ढांचे को कहते हैं जो किसी जलाश्य में धरती के निकले हुए भाग पर बना हो। यह मूल रूप से फ़्रान्सीसी भाषा के “जेते” (jetée) शब्द से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ “फेंका हुआ” होता है। किनारे पहुँचने पर नाव को स्थिर करने हेतु रस्सियाँ फेंक कर बाँधी जाती हैं। जेटियाँ अक्सर नौकाओं को समुद्र की थपेड़ों और तेज़ हवाओं से सुरक्षित रखने के लिये बनाई जाती हैं। फेरी ने लंगर डाला और हम पार लग गए। इस एक जेट्टी से उस पार दूसरी जेट्टी कई फेरे लगाने से इनका नाम फेरी पड़ गया है।
टैक्सी ड्राइवर मनोज साहा को फ़ोन करके बुला लिया। वापसी यात्रा का अगला पड़ाव कोलकाता है। रास्ते में बेलपुकुर गाँव में एक मिठाई की दुकान पर रुक वहाँ मिष्ठु मलाई चाप और संदेश चखा। वहाँ “ओ रे माँझी” गीत बज रहा था। उसके बाद मन की सुई ओ रे माझी गीत पर अटक गई।
ओ रे माँझी ……… ओ रे माँझी ॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
ओ ओ मेरे माँझी
मेरे साजन हैं उस पार,
मैं मन मार, हूँ इस पार
ओ मेरे माँझी, अबकी बार,
ले चल पार, ले चल पार
मेरे साजन हैं उस पार…
यह गीत मोबाइल पर वाईफ़ाई से टैक्सी के स्पीकर पर सेट कर दिया। फिर आनंद स्रोत खुल गए । इसमें भी “राधा” और “कृष्ण” के आत्मा और परमात्मा रूपक निराले मिलन दृश्य मस्तिष्क की स्क्रीन पर उभरने लगे। इसमें हक़ीक़ी और मज़ाज़ी दोनों रस हैं। ये अमर गीत है।
मत खेल जल जाएगी (तृष्णा),
कहती है आग मेरे मन की
मैं बंदिनी (राधा-आत्मा) पिया (कृष्ण-परमात्मा) की चिर संगिनी हूँ साजन की
मेरा खींचती है आँचल मन मीत तेरी हर पुकार
मेरे साजन हैं उस पार
ओ रे माँझी (काल) ……… ओ रे माँझी.… ओ ओ मेरे माँझी
ले चल पार॰॰॰॰अब की बार॰॰॰ले चल पार।
जल की बहुलता से बंगाल में नाव और माँझी लोक कलाओं के जीवंत पात्र हैं। बंगाली माटी के संगीतज्ञ सचिन देव बर्मन ने शास्त्रीय, रवींद्र और लोक धुनों को मिलाकर जादू रचा है। उनके जादू पर मोहित होकर मराठी मास्टर रमेश तेंदुलकर ने जादुई बेटे का नाम सचिन तेंदुलकर रखा था।
बंगाल संस्कृति की तरह बंगाली भाषा भी एशिया में सबसे विकसित सांस्कृतिक भाषा परंपराओं में से एक है। प्राचीन संस्कृत और मगधी प्राकृत की वंशज बंगाली भाषा पाल और सेन राजवंश के शासन में हिंदी से पहले लगभग 1000-1200 ईस्वी तक विकसित हुई। यह अरबी और फारसी के प्रभाव को अवशोषित कर बंगाल में सल्तनत काल की भी एक आधिकारिक अदालती भाषा बन गई थी।
हमारी यात्रा के दौरान बंगाल में पंचायत चुनाव का माहौल है। उपद्रव आगजनी हत्यारों का दौर चल रहा है। डायमंड हार्बर और कोलकाता के बीच उपद्रव की खबरें हैं। इसलिए ड्राइवर ने शॉर्टकट लेने के चक्कर में गाड़ी को अत्यंत घने ग्रामीण इलाक़े से गुज़रने वाले रास्ते पर उतार दी। रास्ते पर ग्रामीण बंगाली जीवन के दर्शन होने लगे। बीच में एक बड़ा सरोवर है। उसके चारों तरफ़ झोपड़ीनुमा कच्चे घर हैं। घर के दरवाज़े से चार-पाँच कच्ची सीढ़ियाँ उतरते ही निस्तार हेतु सरोवर का पानी मिल जाता है। बंगाली नारियाँ साड़ी कटि में खौंस बच्चों को नहला रही हैं। घर के भीतर ही मुर्गियाँ और बकरियां खुली घूम रही हैं। यहाँ एक-दो प्रतिशत हिंदू छोड़कर पूरी आबादी मुस्लिम है। लेकिन कभी दंगे या धर्म परिवर्तन की घटनाएँ नहीं हुईं। इसके दो कारण बताए जाते हैं। एक तो बंगाली मुसलमान शान्तिप्रिय होते हैं। दूसरा यहाँ उपद्रवी बिहारी मुसलमान नेताओं की पैठ नहीं है। स्थानीय लोग मुसलमान होकर भी उनकी संस्कृति हिंदू ही है।
बंगाली भाषा ने मध्य काल में 16वीं और 17वीं शताब्दी में धर्म निरपेक्ष साहित्य का विकास किया। यह भाषा अराकान (छंद) में भी बोली जाती थी। बंगाली पुनर्जागरण के दौरान कलकत्ता में 19वीं और 20वीं सदी में भाषा का आधुनिक मानकीकृत रूप विकसित हुआ आनंद मठ के रचयिता बंकिम चंद चट्टोपाध्याय जैसे महान साहित्यकार हुए। रवींद्रनाथ टैगोर 1913 में “गीतांजली” के लिए साहित्य में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले पहले गैर-यूरोपीय भारतीय साहित्य नोबेल पुरस्कार विजेता बने। ऋत्विक घटक ने टैगोर के बारे में कहा, “उस व्यक्ति ने मेरे जन्म से काफी पहले मेरी समस्त भावनाओं को दुर्बल कर दिया … मैं उन्हें पढ़ता हूँ और पाता हूं कि …मेरे पास कहने के लिए कुछ भी नया नहीं है।” ऋत्विक घटक ने अपनी फ़िल्मों मेघे ढाका तारा (बादलों से आच्छादित सितारा) और सुवर्ण रेखा में बंगाल-विभाजन के बाद की मार्मिकता को व्यक्त करने के लिए रवींद्रसंगीत का उपयोग किया है।
1941 में टैगोर की मृत्यु हो गई लेकिन उनका गौरव और उनके गीतों का प्रभाव अनन्त है। अपने गीतों में, उन्होंने कविता को सृष्टिकर्त्ता, प्रकृति और प्रेम से एकीकृत किया गया है। मानवीय प्यार (प्रेम) सृष्टिकर्त्ता के प्रति समर्पण (भक्ति) में बदल जाता है। उनके 2000 अतुल्य गीतों का संग्रह गीतबितान (गीतों का बगीचा) के रूप में जाना जाता है। इस पुस्तक के चार प्रमुख हिस्से हैं- पूजा (पूजा), प्रेम (प्यार), प्रकृति (प्रकृति) और बिचित्रा (विविध)। हालांकि, कई गीतों में यह वर्गीकरण भेद पिघल जाता है। बारिश से सम्बंधित एक गीत प्रेमी के लिए तड़प दर्शाता है। एक प्रेम गीत सृष्टिकर्त्ता के लिए प्रेम में बदल सकता है। उनका एक गीत है- “तुम मेरे गीत से परे खड़े हो। मेरे स्वरों की ध्वनि तुम्हारे चरणों तक पहुंचती है लेकिन मैं तुम तक नहीं पहुंच पाता।”
बंगाल कई चीजों के लिए प्रसिद्ध है, और उनमें सबसे महत्वपूर्ण है मुंह में पानी लाने वाले रसगुल्ला, चोमचोम और रसमलाई, सुपर स्वादिष्ट सोरशे इलिश और चिंगरी माचेर, मलाई करी अत्यधिक चलन में है। इस क्षेत्र की सबसे पसंदीदा मछलियों में हिलसा या इलिश फिश करी को बहुत पसंद किया जाता है। यह तीखी महक वाली करी कलौंजी और मिर्च से तैयार की जाती है। आलू के व्यंजन को बनाने के अलग-अलग तरीके हैं, लेकिन यह बंगाली घरों में लोकप्रिय बना हुआ है। अगर घर में और कुछ नहीं है तो आलू हमेशा रहता है। इस को कई अलग-अलग मसालों के साथ कई अलग-अलग तरीकों से तैयार किया जाता है। यह आमतौर पर लूची के साथ खाया जाता है, जो एक अन्य बंगाली व्यंजन है। मिष्टी दोई एक मीठा दही व्यंजन है जिसे रात के खाने के अंत में परोसा जाता है हालाँकि अब पूरे देश में पसंद किया जाता है।
बंगाल के उर्दू शायर काजी नजरूल इस्लाम को ब्रिटिश भारत के विद्रोही कवि के रूप में जाना जाता था। उर्दू पॉलिटिक्स से अनुप्राणित 1905 में बंगाल विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल में एक विशिष्ट उर्दू संस्कृति विकसित हुई, जो बाद में पूर्वी पाकिस्तान और बांग्लादेश बन गई।
कोलकाता पहुँच कर साल्ट लेक स्टेडियम के गेट नंबर दो के सामने स्वीट एंड सोर रेस्टोरेंट में परम्परा गत बंगाली राइस प्लेट से लंच किया। जिसमें भात, सब्ज़ी, दाल के साथ आम की खट्टी मीठी लौंजी थी। मछली खाने वालों ने मच्छी करी अलग से ऑर्डर कर दी। दमदम में एयरपोर्ट के गेट नंबर तीन के पास एयरपोर्ट सिटी होटल में कमरा बुक करा लिया था। दिन के तीन बजे होटल के कमरे में थे।
शाम को कलकत्ता का प्रसिद्ध दक्षिणेश्वर मंदिर घूमने गए । दक्षिणेश्वर काली मन्दिर उत्तर कोलकाता में विवेकानन्द सेतु के कोलकाता छोर के निकट हुगली नदी के किनारे स्थित है। इस मंदिर की मुख्य देवी भवतारिणी काली है, जो काली माता ही है। वर्तमान दक्षिणेश्वर मंदिर का निर्माण सन 1847 में प्रारम्भ हुआ था। अंग्रेज बंगाल में लगान वसूली हेतु ज़मींदारी व्यवस्था लागू कर चुके थे। कलेक्टर व्यवस्था 1861 में आनी थी। जान बाजार की ज़मीन्दार, रानी रासमणि को माँ काली ने स्वप्न में आदेश दिया कि शक्ति मंदिर का निर्माण किया जाए। सन 1855 में मंदिर का निर्माण पूरा हुआ। यह मंदिर 25 एकड़ क्षेत्र में स्थित है। जिस टैक्सी से कॉकद्वीप से कलकत्ता पहुँचे थे। उसी से यह भी तय कर लिया था कि वही शाम को दक्षिणेश्वर काली मंदिर दर्शन कराएगा। वह होटल के आसपास रुका रहा। होटल में चेक-इन करके कमरे में आधा घंटा कमर सीधी कर घूमने निकले।
दक्षिणेश्वर काली मन्दिर प्रख्यात दार्शनिक एवं रामकृष्ण मिशन के संस्थापक विश्व पटल पर प्रखर सनातन प्रवक्ता स्वामी विवेकानंद के गुरु हिन्दू नवजागरण के प्रमुख सूत्रधार स्वामी रामकृष्ण परमहंस की कर्मभूमि रही है। वर्ष 1857-68 की कालावधि में स्वामी रामकृष्ण इस मंदिर के प्रधान पुरोहित रहे। तत्पश्चात उन्होंने इस मन्दिर को ही साधना स्थली बना लिया। स्वामी रामकृष्ण परमहंस से इसका जुड़ाव इस मन्दिर की प्रतिष्ठा और ख्याति का प्रमुख कारण है। मंदिर के मुख्य प्रांगण के उत्तर पश्चिमी कोने में रामकृष्ण परमहंस का कक्ष आज भी उनकी स्मृति के रूप में संरक्षित रखा गया है।
हमने टैक्सी से उतर कर एक रुपया प्रति जोड़ी के हिसाब से स्टैंड पर जूते रखे। फिर एक रुपया प्रति मोबाईल के हिसाब से मोबाईल अभिरक्षा में रख कर काली मंदिर दर्शन की पंक्ति में लग गए। शनिवार का दिन होने से शाम को अधिक भीड़ थी। फिर भी आधा घंटा में दर्शन हो गए। हम एक स्थान पर बैठ कर रामकृष्ण परम हंस की आध्यात्मिक विवेचना और मंदिर निर्माण के इतिहास पर सोचते रहे। किंवदंती है कि स्वामी रामकृष्ण परमहंस को काली माता दर्शन देती थीं। पवन भाई प्रांगण में घूमने निकल लिए। जब वे आधा घंटा नहीं आये तो हम उनको ढूँढने निकले। वे प्रांगण में नहीं मिले तो हम वहाँ से बाहर निकल गंगा नदी किनारे उन्हें देखने पहुँचे। वे वहाँ भी नहीं मिले। गंगा प्रवाहित दिख गई। अब किसकी ज़रूरत थी।
गंगा दोनों किनारों तक लबालब भरी बह रही थी। उसमें बहाव तेज था पर भरी होने से कम दिख रहा था। ऐसा लगा कि 2400 किलोमीटर चलकर सागर से मिलने के पहले गंगा ठिठक गई है। विचार आया कि हिंदुओं की आस्था की प्रतीक गंगा सदियों से इसी तरह प्रवाहित है। प्रागवौदिक से वैदिक और उत्तरवैदिक युग के बाद उपनिषदीय युग से होती हुई महाकाव्य काल और पौराणिक काल तक की सनातन षठदर्शन सभ्यता की साक्षात प्रतीक यह गंगा मन को आह्लादित कर देती है। आस्थावान हिंदू के हृदय से स्वेमव स्फुरण होता है- हर-हर गंगे।
हमारा बहत्तरवाँ साल चल रहा है। आज से इकहत्तर साल पहले हम नहीं थे और शायद पाँच-दस साल बाद इस नश्वर देह में नहीं होंगे, लेकिन गंगा सदियों से प्रवाहित है और पृथ्वी के अस्तित्व तक प्रवाहित होती रहेगी। मान्यता है कि हमारी आत्मा परमात्मा में विलीन होगी और देह धरा की धूल होकर गंगा की धरोहर होगी। हमारा क्या, सभी का यही अंतिम हश्र है। इस वसुंधरा पर जीव जंतु के प्रथम आगमन या उद्गम से यह परिपाटी अनवरत जारी है। उस समय तक जारी रहेगी जब तक ब्रह्मांड खंड-खंड होकर विखंडित होगा। इस जगत में कुछ भी हमेशा रहने वाला नहीं है। मनुष्य की तरह सूर्य और उसके ग्रहों की भी एक आयु है। मनुष्य की सबसे बड़ी गफ़लत यह है कि वह हरेक चीज को अवचेतन रूप से स्थायी समझता है। जबकि नया बनने के लिए पुराना मिटना अनिवार्यता है। हर कण हर क्षण नया बनने को मिट रहा है। बूँद सागर हो रही है। सागर वाष्पीकरण से आकाश तक उठ रहा है। आकाश धुँध को बूँद-बूँद बादल में बदल रहा है। बादलों को समेट बरस रहा है। यही अनवरत चक्र है। मनुष्य की नियति धुँध से धुँध की यात्रा है। एक धुँध में लिपटा आता है दूसरी धुँध में सिमटा चला जाता है। यही वृतांत है। रवि इस चक्र को चला रहा है। वही चक्र का स्वामी है। उसके ऊपर अंतर्यामी है। सामने भवतारिणी गंगा है। पवन भाई कहीं नहीं दिखे तो हमने टोकन देकर स्टैंड से जूते और मोबाइल उठाए और टैक्सी के नज़दीक पहुँचे ही थे तभी वे सामने से आते दिखे।
गंगा भारत में कुल मिलाकर 2525 किलोमीटर की दूरी तय करती हुई उत्तराखंड में हिमालय के गंगोत्री हिमनद के गोमुख स्थान से लेकर बंगाल की खाड़ी के सुन्दरवन तक विशाल भू-भाग को सींचती है। गंगोत्री से ऋषिकेश, हरिद्वार, प्रयाग, काशी और गंगा सागर प्रमुख तीर्थ हैं। आध्यात्मिक एवं भौतिक प्रकृति के अद्भुत संगम भारत के भूलोक को गौरव तथा प्रकृति का पुण्य स्थल कहा गया है। इस भारत-भूमि तथा भारतवासियों में नये जीवन तथा नयी शक्ति का संचार करने का श्रेय गंगा नदी को जाता है। गंगा को भारत की जीवन-रेखा तथा गंगा की कहानी को भारत की कहानी माना जाता है। गंगा की महिमा अपार है। गंगा एक नदी मात्र नहीं बल्कि एक सभ्यता की प्रतीक है। अत: गंगा की शुद्धता के लिए प्राथमिकता से प्रयास किये जाने चाहिए।
प्रयाग, वाराणसी, कोलकाता, कानपुर आदि न जाने कितने औद्योगिक नगर गंगा के तट पर ही बसे हैं। यहाँ लगे छोटे-बड़े कारखानों से बहने वाला रासायनिक प्रदूषित पानी, कचरा आदि गन्दे नालों तथा अन्य मार्गों से आकर गंगा में ही विसर्जित होता है। वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि सदियों से आध्यात्मिक भावनाओं से अनुप्राणित होकर गंगा की धारा में मृतकों की अस्थियाँ एवं अवशिष्ट राख तो बहाई जा ही रही है, अनेक लावारिस और बच्चों के शव भी बहा दिये जाते हैं। बाढ़ आदि के समय मरे पशु भी धारा में आ मिलते हैं। इन सबने भी गंगा-जल-प्रदूषण की स्थितियाँ पैदा कर दी हैं। गंगा के किनारों और आसपास से वनों का निरन्तर कटाव, वनस्पतियों, औषधीय तत्त्वों का विनाश भी प्रदूषण का एक बहुत बड़ा कारण है।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





