स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं  आपकी भावप्रवण बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली…३।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २५२ – बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली… ३  ✍

(बढ़त जात उजयारो – (बुन्देली काव्य संकलन) से) 

गात ऊजरौ देखकें, ऐंसो उठत बिचार /

जगत तारनी की भयीं, जैसे दो दो धार ||

*

एड़ी बेड़ी बँद रई, अपने जान अभाग ।

एड़ी जब पूरी बूँदी, बेड़ी भई सुहाग ॥

*

एड़ी ऐसी जँच रई, जैसे लगै कपास ।

अतर गुलाबी सौख कें, फेंकत रैत उजास ||

*

पगतल, करतल होत जब, ऐंसी परत गुमान ।

जैसे पीपर पात पै, दै गई औस निसान ||

*

पैंग बढाउत मन दिखै, गदराई सी देह ।

ऐंसो औसर पाय कें, नैना करें सनेह ॥

*

गोरी आई सासरे, लयें चौथ को चाँद ।

पाहूँ पाहूँ अमावस, बाँदे सकै सो बाँद ॥

*

अगहन महिना काम कौ, भओ जगत लौ लीन।

रात रतन धन लै भगी, रै गई भोर भलीन ||

*

सरद वरद रितु आ गई, गई मेघ की पाँत ।

फूले फूल तलाब में,

सिसिर सरोदे में रहौ,

भौंरन भीर बढ़ात ॥

चहो नारि कौ नेह ।

दुनिया भर को ताप तप, सिमट भरी बा-देह ।।

*

पावस कौ दिन रात-सो, रात रतौंधी होय ।

दिन दूनो हो रतजगा, जाग जगा के सोय ||

*

मानुस पंछी रूख पसु, सहैं जेठ उतपात ।

जेठन की भौं देखकें, धीरज धीर गमात ॥

*

चलत फिरत रसरी रहत, बस ही बस कर आज ।

कसमस कसमस कस करत, दोर खड़े रितुराज ||

☆

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

1 Comment
Oldest
Newest Most Voted
Dr Bhavna Shukla
0

सादर नमन