श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “कलयुगी – रावण”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # १९३ – कलयुगी – रावण ☆
☆
गाँव की एक
भोली-भाली
युवती के मन में ,
विजया – दशमी
मनाने की चाह उमड़ी।
रात में वह अपने घर से,
दशहरा मैदान को
अकेले ही निकली ।
रास्ते में ही उसे
कुछ सदेह रावण मिल गए ।
जो सतयुगी रावण से
बहुत भारी पड़ गये ।
रावण को जलते हुये
देखने की चाह में
आज वह स्वयं ही
जिंदा जल रही थी ।
और एक नहीं ,
दस कलयुगी रावणों से
बुरी तरह घिर गयी थी ।
सदियों से चले आ रहे
इस पर्व के औचित्य पर
आज वह प्रश्न चिन्ह
लगा रही थी ।
और इस आधुनिक समाज से
न्याय की गुहार लगा रही थी ।
☆
© मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002
मो 94258 62550
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




