स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द अब नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – शब्द अब नहीं रहे शब्द…।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २५८ – शब्द अब नहीं रहे शब्द
(काव्य संग्रह – शब्द अब नहीं रहे शब्द)
शब्द को ब्रह्म कहा गया है
और ब्रह्म को देखा नहीं किसी ने
शब्द को भी कोई कहाँ देख पाता है
हाँ सुन पाता है उसे
अगर सुनना चाहे तो ।
मगर, क्या होता है मात्र सुनने से
जबकि अर्थहीन हो गए हों शब्द
लगता है शब्दों की केंचुली उतर गई है
बदल गई है उनकी तासीर
अब प्रेम शब्द न तो स्निग्धता देता है
न ऊर्जा
और विश्वास का दावा
कानों में उड़ेल देता है पिघला शीशा
सम्बोधन के सारे शब्दों से
सड़ी मछली की बू आने लगी है
शब्द अब शब्द नहीं रहे।
☆
© डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







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