डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय आलेख – ‘विश्वग्राम के नागरिक (वैचारिकी) ‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३१५ ☆

☆ आलेख ☆ विश्वग्राम के नागरिक (वैचारिकी)

आज के अखबार में पढ़ने को मिला कि भारत की पवित्र भूमि को त्याग कर लगभग 2 लाख नागरिक हर वर्ष विदेश में बस रहे हैं। पिछले 5 सालों में 9 लाख नागरिकों ने भारत की नागरिकता छोड़ी। पढ़कर आश्चर्य हुआ। जहां हम ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ गाते थकते नहीं हैं, वहां इस देश की तरफ बेरुखी से मुंह फेर लेने वाले कौन हैं?

देश छोड़ने की वजहें ढूंढ़ें तो अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान जैसे देशों में रहन-सहन का बेहतर स्तर, बेहतर कमाई की बात समझ में आती है। कुछ देशों को लोग टैक्स से बचने के लिए जाते हैं। ऐसे कम टैक्स वाले देशों को ‘टैक्स हेविन’ कहा जाता है। अभी प्रदूषण के कारण दिल्ली के 80% लोग दिल्ली छोड़ने की सोच रहे हैं। इनमें से कितने विदेश उड़ जाएंगे और कितने भारत में ही कोई अन्य शहर ढूंढ़ेंगे कह पाना मुश्किल है।

कुछ चतुर लोग देश के बैंकों से भारी भरकम कर्ज़ लेकर विदेश पलायन कर गये और वहां सुखी जीवन जी रहे हैं। सामान्य आदमी यही समझने में लगा है कि उनके कर्ज की रकम के 9 हजार करोड़ या 12 हजार करोड़ होते कितने हैं और इसके लिए 9 या 12 में कितने ज़ीरो लगते हैं। यह समझना भी मुश्किल है कि इतना रुपया देश से निकलने पर संबंधित बैंकों की स्थिति पर क्या फर्क पड़ा है।

जो भी हो, देश छोड़कर जाने की कूवत उन्हीं में होती है जिन पर लक्ष्मी की पर्याप्त कृपा होती है। पक्षियों की तरह इनके लिए भी कोई बॉर्डर नहीं होता। ये विश्व नागरिक होते हैं। इनके लिए कोई गंदगी, कोई प्रदूषण नहीं होता। ये जहां भी जाते हैं वहां बैठकर खिड़की से बाहर प्रकृति की सुषमा निहार कर ‘सुजलां, सुफलां, मलयज शीतलां’ का आनंद लेते हैं।

इसके विपरीत देश का सामान्य आदमी मिलावट वाली चीज़ों का उपयोग करने और बाढ़, प्रदूषण झेल कर ‘जीना यहां, मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां’ की स्थिति को झेलता है। ऐसे में यदि आदमी कमाई के लिए अनैतिक तरीकों का उपयोग करे तो उसे कैसे रोका जाए?

यह भी पढ़ा कि दुनिया के धनी लोग धीरे-धीरे सभी संस्थाओं पर हावी होते जाते हैं। सारे नियम कायदे उनकी सुविधा के हिसाब से बदल जाते हैं। उन पर कोई कानून काम नहीं करता। इस संबंध में तुलसीदास जी की चौपाई ‘समरथ को नहिं दोस गुसाईं’ इन पर खूब फिट बैठती है।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments