श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “काँच सा मन” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १३१ ☆ काँच सा मन ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
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ज़रा सी बात पर क्यों
टूटता है
काँच सा मन।
गल रहे अनुबंध
निर्वासित हुई सौगंध
साँसों में कसकते हैं
अनगाए मधुर संबंध
रात के अंधे पहर क्यों
तापता है
आँच सा मन।
तृप्ति का अहसास
होंठों पर सुलगती प्यास
आँखों में महकते हैं
सपनों के खुले मधुमास
झूठ के फिर आवरण क्यों
ओढ़ता है
साँच सा मन।
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© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)
मो.07869193927,
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




