श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना वर्ल्ड वेटलैंड डे। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – कविता # २७५ ☆ वर्ल्ड वेटलैंड डे…

प्रकृति की सबसे शांत भाषा पानी है।जहाँ पानी ठहरता है, वहीं जीवन आकार लेता है। नदियाँ, झीलें, तालाब, पोखर और दलदली भूमि-इन्हें ही वेटलैंड्स कहा जाता है।

ये केवल जलस्रोत नहीं हैं, बल्कि प्रकृति की नाज़ुक जीवनधारा हैं। हर वर्ष 2 फ़रवरी को वर्ल्ड वेटलैंड डे मनाया जाता है, ताकि हम यह समझ सकें कि वेटलैंड्स की रक्षा करना,असल में जीवन की रक्षा करना है। पानी जहाँ थमता है,वहीं जीवन बोलता है…

वेटलैंड्स पक्षियों का आश्रय हैं,मछलियों का घर हैं, मिट्टी को उपजाऊ बनाने का आधार हैं और पर्यावरण को संतुलित रखने की अदृश्य शक्ति भी।

जब हम अपने गार्डन में नमी भरी मिट्टी देखते हैं, फूलों पर मंडराती तितलियाँ देखते हैं, या चिड़ियों को पानी पीते देखते हैं, तो यह सब हमें वेटलैंड्स के महत्व की याद दिलाता है। हर छोटा गार्डन, प्रकृति का एक मौन संदेश होता है। गार्डन केवल सौंदर्य नहीं है, वह प्रकृति से जुड़ने का माध्यम है। थोड़ा-सा पानी, थोड़ी-सी मिट्टी और थोड़ा-सा प्रेम। बस इतना ही चाहिए जीवन को पनपने के लिए। आज जब शहरीकरण बढ़ रहा है, तालाब सूख रहे हैं, और नदियाँ सिमटती जा रही हैं। तब यह और भी ज़रूरी हो जाता है कि हम अपने स्तर पर प्रकृति को सँभालें।

प्रकृति विशाल है, पर उसकी साँसें बहुत नाज़ुक हैं। पानी की बचत करना, हरियाली बढ़ाना, अपने गार्डन को जीवंत रखना। ये छोटे-छोटे प्रयासवेटलैंड्स संरक्षण की दिशा में बड़ा योगदान बन सकते हैं। वर्ल्ड वेटलैंड डे हमें यही सिखाता है कि प्रकृति हमसे कुछ माँगती नहीं, बस समझदारी चाहती है। जहाँ वेटलैंड्स जीवित हैं, वहीं भविष्य सुरक्षित है।

प्रकृति से जुड़ना केवल पर्यावरण की चिंता नहीं,यह आत्मा की शांति का मार्ग भी है। जो इसे सहेजता है,वह अनजाने में स्वयं को भी सहेज लेता है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments