श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “शांत दिनों की साधना : शीतलाष्टमी से नवरात्रि तक…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८१ ☆ शांत दिनों की साधना : शीतलाष्टमी से नवरात्रि तक… ☆
भारतीय जीवन में उत्सव केवल तिथियों का क्रम नहीं हैं, वे मन की तैयारी और सांस्कृतिक चेतना की एक निरंतर यात्रा हैं। कोई भी पर्व अचानक नहीं उतरता; वह धीरे-धीरे ऋतुओं की चाल के साथ हमारे भीतर स्थान बनाता है।
फाल्गुन की चहल-पहल और रंगों की स्मृतियों के बाद जब चैत की आहट सुनाई देती है, तब कृष्ण पक्ष के ये शांत दिन मानो जीवन की गति को थोड़ा थाम लेने का अवसर देते हैं। यह समय बाहरी उत्सवों की चकाचौंध से अधिक भीतर की सजगता का समय होता है—एक ऐसी साधना, जिसमें मन स्वयं को आगामी पर्वों के लिए तैयार करता है।
इन्हीं दिनों में आती है शीतला अष्टमी। लोकजीवन में यह बसोरा के रूप में भी जानी जाती है। इस दिन रसोई की अग्नि को विश्राम दिया जाता है और एक दिन पूर्व बनाया गया बासा भोजन श्रद्धापूर्वक ग्रहण किया जाता है। पहली दृष्टि में यह एक साधारण परंपरा प्रतीत होती है, किंतु इसके भीतर लोकबुद्धि का गहरा संतुलन छिपा है—स्वास्थ्य, स्वच्छता और संयम का संतुलन।
शीतला माता की पूजा करते हुए घरों में एक अलग प्रकार की शांति उतर आती है। चूल्हा भले ही न जले, पर श्रद्धा की एक उजली लौ पूरे घर में फैल जाती है। यह विराम हमें स्मरण कराता है कि जीवन में निरंतर गति जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है ठहरना भी।
यही ठहराव आगे आने वाले नवरात्रि की भूमिका भी रचता है। शक्ति की आराधना का यह महान पर्व केवल नौ दिनों की उपासना भर नहीं, बल्कि उससे पहले की यह मानसिक तैयारी भी उसका एक महत्वपूर्ण आधार है। कृष्ण पक्ष के ये दिन हमें संकेत देते हैं कि अब अपने भीतर की अनावश्यक व्यग्रताओं को धीरे-धीरे कम किया जाए, घर-आँगन को सहेजा जाए और मन में श्रद्धा के लिए एक निर्मल स्थान बनाया जाए।
भारतीय संस्कृति की यही विशेषता है कि यहाँ हर बड़े उत्सव से पहले एक शांत प्रस्तावना होती है—जैसे संगीत से पहले की धुन, या भोर से पहले का वह सन्नाटा जिसमें प्रकाश जन्म लेता है।
इस दृष्टि से देखें तो शीतलाष्टमी केवल एक लोकपर्व नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक क्रम का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो हमें आने वाली नवरात्रि की ऊर्जा के लिए भीतर से तैयार करता है।
कृष्ण पक्ष के ये पंद्रह दिन इसलिए रिक्त नहीं हैं।
वे मन को संयत करने की एक साधना है
ताकि जब शुक्ल पक्ष का चंद्रमा बढ़े,
तो उसके साथ हमारी आस्था और बलवती हो सके।
शायद इसी कारण भारतीय संस्कृति ने उत्सवों के बीच ऐसे शांत पड़ाव रचे हैं, जहाँ मन स्वयं से संवाद कर सके। शीतलाष्टमी का यह सहज विराम और नवरात्रि की आने वाली ऊर्जा—दोनों मिलकर हमें यह स्मरण कराते हैं कि शक्ति की उपासना केवल बाहरी अनुष्ठानों से नहीं, बल्कि भीतर की निर्मलता और संतुलन से पूर्ण होती है।
कृष्ण पक्ष के ये शांत दिन हमें ठहरकर देखने का अवसर देते हैं—अपने भीतर, अपने परिवेश में और अपनी परंपराओं में। जब मन का आकाश निर्मल हो जाता है, तभी आस्था का चंद्रमा पूर्णता की ओर बढ़ता है,इसीलिए हमारे उत्सव केवल मनाए नहीं जाते—
वे पहले भीतर जागते हैं,
फिर जीवन में उजाला भर देते हैं।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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