स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६१ ☆

☆ जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !! ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

☆

दर्शन के लिये, पूजन के लिये, जगदम्बा के दरबार चलो

मन में श्रद्धा विश्वास लिये, मां का करते जयकार चलो !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

* 

है डगर कठिन देवालय की, माँ पथ मेरा आसान करो

मैं द्वार दिवाले तक पहुँचू, इतना मुझ पर एहसान करो !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

 *

उँचे पर्वत पर है मंदिर, अनुपम है छटा, छबि न्यारी है

नयनो से बरसती है करुणा, कहता हर एक पुजारी है !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

 *

मां ज्योति तुम्हारे कलशों की, जीवन में जगाती उजियाला

हरयारी हरे जवारों की, करती शीतल दुख की ज्वाला !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

 *

जगजननि माँ शेरावाली ! महिमा अनमोल तुम्हारी है

जिस पर करती तुम कृपा वही, जग में सुख का अधिकारी है !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

 *

तुम सबको देती हो खुशियाँ, सब भक्त यही बतलाते हैं

जो निर्मल मन से जाते हैं वे झोली भर वापस आते है !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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