श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “भक्ति, शक्ति और हरियाली…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८४ ☆
☆ हनुमान जयंती विशेष – भक्ति, शक्ति और हरियाली… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
भक्ति, शक्ति और हरियाली: हनुमान जी का वो संदेश जिसे आज का युवा भूल रहा है… और फिर से पा सकता है।
हनुमान जयंती केवल शक्ति और पराक्रम का उत्सव नहीं, बल्कि अटूट भक्ति और प्रकृति से जुड़ाव का भी पावन अवसर है। हनुमान जी की सबसे बड़ी पहचान उनकी शक्ति नहीं, उनकी निष्कलंक भक्ति है—एक ऐसी भक्ति जिसमें अहंकार नहीं, केवल समर्पण है।
आज की युवा पीढ़ी सफलता, नाम और पहचान की दौड़ में कहीं न कहीं भीतर की शांति और जुड़ाव खोती जा रही है। ऐसे समय में हनुमान जी का जीवन हमें याद दिलाता है कि सच्ची शक्ति भक्ति से ही जन्म लेती है। जब मन ईश्वर से जुड़ता है, तब वही ऊर्जा प्रकृति के प्रति प्रेम में भी बदल जाती है।
हनुमान जी “पवनपुत्र” हैं—वायु के पुत्र। उनकी भक्ति केवल प्रभु तक सीमित नहीं थी, बल्कि हर उस तत्व तक फैली थी जो जीवन को सम्भव बनाता है। यही कारण है कि उनकी भक्ति हमें सिखाती है कि पेड़-पौधे, जल, वायु—ये सब भी पूजनीय हैं। जब हम एक पौधा लगाते हैं, उसकी सेवा करते हैं, तो वह भी एक प्रकार की भक्ति ही है—प्रकृति के प्रति समर्पण की भक्ति।
युवा अगर इस भाव को समझ ले, तो उसकी ऊर्जा केवल स्वयं तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि समाज और पर्यावरण को भी संवारने लगेगी। आज की “ग्रीन मोटिवेशन” दरअसल वही भक्ति है, जो हनुमान जी ने अपने जीवन से सिखाई—सेवा, संरक्षण और संतुलन।
इस हनुमान जयंती पर, आइए हम केवल मंदिरों में दीप न जलाएँ, बल्कि अपने भीतर भी भक्ति का दीप प्रज्वलित करें। एक पेड़ लगाएँ, उसे प्रेम से सींचें, और हरियाली को अपना साथी बनाएँ। यही भक्ति का आधुनिक रूप है—जहाँ ईश्वर और प्रकृति दोनों का सम्मान हो।
“हनुमान जी की भक्ति जब जीवन में उतरती है, तो हाथ सेवा में लगते हैं और दिल प्रकृति से जुड़ जाता है।”
आपका यह भाव ही भक्ति को जीवित रखेगा और धरती को भी हरा-भरा बनाएगा।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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