श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७७ ☆ देश-परदेश – लस्सी ☆ श्री राकेश कुमार ☆

वैसे तो अपने हर शहर की लस्सी प्रसिद्ध होती हैं। लेकिन गुलाबी शहर का ये लस्सीवाला तो द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति से पूर्व काल (1944) का है। ये भी कह सकते हैं, अंग्रेजों के जमाने का है।

दही की लस्सी को पंजाब वाले अपना आविष्कार मानते हैं। हरियाणा वाले भी हिसार की भैंसों के दूध की दही की लस्सी को विश्व की सर्वोत्तम लस्सी का खिताब देते हैं। आप इसको चंडीगढ़ जैसा मसला मान सकते हैं, या फिर रसगुल्ला के जन्म स्थान बंगाल और उड़ीसा के बीच के विवाद जैसा समझ सकते हैं।

पुराने जयपुर (walled city) और नए शहर के मध्य में मिर्जा इस्माइल रोड पर ये दुकान स्थित है। आस पास में परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा भी लस्सीवाला के नाम से मिलते जुलते नाम रख कर लस्सी बेचकर चांदी काटे जा रहे हैं।                            

लस्सी का सेवन मिट्टी के छोटे और बड़े सिकोरे (ग्लास) में उपलब्ध रहता है। सुबह सात बजे से तीन बजे दोपहर तक या स्टॉक रहने पर ही इसकी सप्लाई चालू रहती है। लस्सी अपेक्षाकृत गाढ़ी रहती है और लकड़ी की चम्मच से खाई भी जाती है। हमारे जैसे तो एक बार मुंह में ग्लास लगाने के बाद पेंदा देखकर ही रुकते हैं। बचपन से ही परिवार में इसका चलन था। दादाजी का एक कांसे का ग्लास जिसकी क्षमता तीन पाव करीब सात सौ मिलीलीटर थी। हमारा भी प्रिय बर्तन हुआ करता था।

युवावस्था में हमारे बैंक की जबलपुर सिटी शाखा से जुड़ी हुई लस्सी की प्रसिद्ध दुकान हुआ करती थी। सन ’75 के आस पास सवा रुपे का एक ग्लास मिलता था। उन दिनों में रेजगारी की किल्लत हुआ करती थी, इसलिए अकेले ही अनेकों बार चार ग्लास गटक जाया करते थे, ताकि रेजगारी की झंझट ही ना हो।

वर्तमान समय में नींबू के भाव कम करने में लस्सी सबसे अचूक हो रहीं हैं। मन में विचार आया, इसकी चर्चा कर लेते हैं, क्योंकि मीठा का सेवन तो अब प्रतिबंधित हो चुका है। कम से कम चर्चा तो कर ही सकते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈


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