श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१६ ☆
व्यक्तित्व और कृतित्व – सुरेश पटवा एक “अल्हदा और नए तरह के लेखक”
श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
सुरेश पटवा” “कलम और कदम का अनूठा समन्वय है।
जब हम समकालीन हिंदी साहित्य के परिदृश्य को देखते हैं, तो हमें कई तरह के लेखक मिलते हैं, कुछ जो कमरों में बैठकर कल्पनाएं बुनते हैं, और कुछ जो इतिहास के पन्नों को पलटते हैं। लेकिन आज मैं एक ऐसे अनूठे ‘सृजन साधक’ की बात करने जा रहा हूँ, जिनकी कलम में इतिहास की गंभीरता भी है और जिनके कदमों में पूरी दुनिया को नाप लेने का कौतूहल भी। मैं बात कर रहा हूँ, सुरेश पटवा की।
अक्सर लोग बैंक से रिटायर होने के बाद आराम की जिंदगी चुनते हैं, लेकिन सुरेश पटवा जी बैंक की दीर्घकालीन सेवा के बाद अपने जीवन की सबसे ऊर्जावान पारी जी रहे हैं। 74 वर्ष की इस युवा उम्र में, वे 34 प्रकाशित कृतियों और 16 से अधिक राष्ट्रीय सम्मानों के साथ हमारे बीच साहित्य की एक जीती-जागती धरोहर हैं। “
उनके लेखन की सबसे अनूठी और रोचक बात उनका यायावर होना है। वे सिर्फ मेज पर बैठकर लिखने वाले साहित्यकार नहीं हैं। उन्होंने नर्मदा जी की परिक्रमा की, तो ‘सौंदर्य, समृद्धि, वैराग्य की नदी नर्मदा’ लिख दी। उन्होंने मोटर साइकिल उठाई और सिक्किम, भूटान, नेपाल, लद्दाख और उत्तराखंड की दुर्गम वादियों को छान मारा। कार से कोलकाता से कन्याकुमारी और वहां से द्वारकापुरी तक की तटीय यात्रा कर डाली। अमेरिका और यूरोप घूम आए।
यानी पटवा जी पहले जमीन पर अपने ‘कदम’ चलाते हैं, अनुभूतियों को जीते हैं, और फिर उनकी ‘कलम’ चलती है। यही कारण है कि जब वे ‘सगरमाथा से समुंदर तक’ या ‘सुरम्य सतपुड़ा’ लिखते हैं, तो पाठक सिर्फ पढ़ता नहीं है, वह पटवा जी की आंख से उस भूगोल की यात्रा करने लगता है।
उनका विषय वैविध्य विस्मित करने वाला है। जब उन्हें इतिहास पढ़ते हुए भारत की गुलामी की पड़ताल करती कोई मुकम्मल किताब नहीं मिली, तो उन्होंने खुद शोध किया और खड़ी कर दी—’गुलामी की कहानी’। एक तरफ वे गोंडवाना के विलुप्त इतिहास पर गंभीर शोध करते हैं, ‘वेदों से वेदांत’ जैसी आध्यात्मिक कृति लिखते हैं, तो दूसरी तरफ ‘हिंदी सिनेमा का स्वर्ण युग’ लिखकर हमारे भीतर के सिनेमाई नोस्टेल्जिया को जगा देते हैं। मिर्जा गालिब पर उनका शोधपूर्ण उपन्यास उनके विधा वैविध्य का अनूठा प्रमाण है। “
“पटवा जी केवल गंभीर इतिहासकार या यात्रा-वृत्तांत लेखक नहीं हैं। उनकी कविताएं और व्यंग्य समाज का मुखपत्र हैं। हाल ही में आए उनके व्यंग्य ‘पेटीकोट-पजामा स्टार्ट-अप’ और पुस्तक ‘व्यंग्य पच्चीसी’ सामाजिक विसंगतियों पर करारा प्रहार हैं।
उनकी कविताओं की एक खास बात है, जो मुझे बहुत प्रभावित करती है, उनकी कविताएं समाज की व्यवस्था से शिकायत तो करती हैं, जिम्मेदार लोगों पर तंज भी कसती हैं, लेकिन उनमें कहीं भी रोना-चीखना या करुणा का प्रदर्शन नहीं है। वे दृढ़ता के साथ, गरिमा में रहकर अपनी बात कहती हैं और चेतावनी देती हैं। यही एक सच्चे साहित्य का धर्म है, जिसका निर्वहन पटवा जी बखूबी कर रहे हैं। “
“आज पटवा जी दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय के संयुक्त सचिव और अखिल भारतीय कला मंदिर के उपाध्यक्ष जैसी अनेक संस्थाओं के माध्यम से नई पीढ़ी के मार्गदर्शक बने हुए हैं।
किताबों की इस आपाधापी भरी भीड़ में, सुरेश पटवा जी का लेखन अपनी सहजता, प्रामाणिकता और रोचक शैली के कारण बिल्कुल ‘अल्हदा’ है। वे जटिल से जटिल ऐतिहासिक और सामाजिक विषयों को इतनी सरलता से परोसते हैं कि वह सीधे पाठक के दिल और दिमाग में उतर जाती है।
पटवा जी का जीवन और उनका साहित्य हमें यह सिखाता है कि सीखने, घूमने और लिखने की कोई उम्र नहीं होती। बस भीतर एक जीवंत कलाकार जिंदा रहना चाहिए। पटवा जी को उनके समृद्ध सृजन संसार के लिए नमन करता हूँ और उनके दीर्घायु व सतत लेखन जीवन की कामना करता हूँ।
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© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव
समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार
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