श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना मिट्टी की गोद से झाँकता जीवन। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८९ ☆

मिट्टी की गोद से झाँकता जीवन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

जून का महीना केवल मौसम का परिवर्तन नहीं, बल्कि जीवन के नवसृजन का संकेत भी है। पहली वर्षा की बूंदें जैसे ही धरती को स्पर्श करती हैं, प्रकृति का मौन संसार जाग उठता है। सूखी प्रतीत होने वाली मिट्टी के भीतर छिपे बीज अचानक अंकुरित होने लगते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि अनेक पौधे ऐसे भी उग आते हैं जिन्हें किसी ने बोया नहीं होता; वे केवल अनुकूल समय और थोड़ी नमी की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं।

अंकुर अर्थात-

 

बीज से निकलने वाली पहली कोमल कोंपल

किसी नए विचार, स्वप्न या संभावना की शुरुआत

विकास और प्रगति का प्रथम चरण

धरती माँ की गोद में, अंकुर होता बीज।
मिट्टी की महिमा अमर, शुभाशीष को दीज।।

छोटे से आकार में, बड़ा हुआ विस्तार।
बीजों का अंकुर बना, वन का सारा सार॥

अंकुर को केवल पौधे की कोंपल नहीं, बल्कि आशा, धैर्य, संभावना और जीवन के नवप्रारंभ के प्रतीक के रूप में भी देखा गया है।

मनुष्य का जीवन भी कुछ ऐसा ही है। हमारे भीतर अनेक संभावनाएँ, सद्गुण और सपने बीज के समान सुप्त पड़े रहते हैं। सही वातावरण, सकारात्मक विचार और थोड़ा-सा प्रयास उन्हें अंकुरित कर सकता है। प्रकृति हमें सिखाती है कि विकास का आरम्भ हमेशा एक छोटे से अंकुर से होता है।

जून की यह आहट हमें एक और संदेश देती है। यदि हम हर वर्ष इस मौसम में एक पौधा भी रोपें और उसकी देखभाल का संकल्प लें, तो आने वाले वर्षों में हरियाली का एक विशाल संसार निर्मित हो सकता है। वृक्ष केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं करते, वे जीवन में शीतलता, संतुलन और आशा भी लाते हैं।

आइए, इस वर्षा ऋतु का स्वागत केवल दर्शक बनकर नहीं, बल्कि सृजनकर्ता बनकर करें। एक पौधा लगाएँ, एक अंकुर को जीवन दें और प्रकृति के साथ अपने संबंध को और गहरा करें। हर अंकुर भविष्य की हरियाली का वचन है, और हरियाली ही जीवन का सबसे सुंदर उत्सव।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted