डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय आलेख – ‘फ्रांस में भारत का डंका  (वैचारिकी)‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४७ ☆

☆ आलेख ☆ फ्रांस में भारत का डंका  (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

इस समय फ्रांस के पेरिस नगर में भारत का डंका गूंज रहा है। प्रसिद्ध ऐफ़िल टावर के कर्मचारी हड़ताल पर चले गये हैं। पेरिस के पास हिंदुओं के स्वामीनारायण संप्रदाय के एक विशाल मंदिर का उद्घाटन हुआ और उसके बाद संप्रदाय के बड़े गुरु जी ने एफ़िल टावर देखने की इच्छा प्रकट की, साथ ही यह निर्देश कि उनकी  उपस्थिति के समय टावर पर से महिला कर्मचारियों को हटा दिया जाए। टावर के प्रबंधक भी ऐसे आज्ञाकारी निकले कि उन्होंने इस निर्देश का पालन किया। फ्रांस जैसे लिंग-भेद से मुक्त देश में यह कदम अभूतपूर्व था।इसी पर बाद में पूरे देश और पूरी दुनिया में जो हल्ला मचा वह अभी तक चल रहा है। सारी दुनिया में हमारे महान देश की जो छवि बन रही है वह बताने की ज़रूरत नहीं है।

स्वामीनारायण संप्रदाय के विश्व में हज़ारों मंदिर है जो अपनी भव्यता और स्थापत्य के लिए जाने जाते हैं। यह बताना ज़रूरी है कि भारत में जो हिंदुओं के सबसे महत्वपूर्ण मंदिर हैं उनका स्थापत्य बहुत साधारण है।

वर्तमान घटना के संदर्भ में यह समझना मुश्किल है कि धार्मिक लोगों को नारी से इतना परहेज़ क्यों है। हमारे देश में नारी सभी रूपों में पूज्य है— चाहे वह मां हो, बहन हो या बेटी। पत्नी के रूप में सीता, पार्वती हमारी आदर्श हैं तो देवी के रूप में हम दुर्गा, काली, लक्ष्मी या सरस्वती के आराधक हैं। वस्तुत: संसार में रौनक स्त्री से ही है। स्त्री का मधुर कंठ, उसके वस्त्रो का रंग, अपने घर को सजाने संवारने की उसकी उत्कंठा, सभी प्राणियों के प्रति उसका स्नेह इसे प्रमाणित करते हैं। जो आज स्त्रियों से दूर रहने का ढोंग करते हैं वे कहां होते अगर स्त्री उन्हें नौ महीने अपनी कोख में आश्रय नहीं देती और अपने पैरों पर खड़े होने तक हर वक्त उनकी देखभाल नहीं करती। हर युग में स्त्रियां संतानों के लिए अपने जीवन को होम करती रही हैं।

अभी एक भावुक कर देने वाला वीडियो देखा जिसमें बेटा मां से पूछता है, ‘यदि तुम्हें एक घंटे बाद मृत्यु होने की सूचना मिले तो कौन सा काम पूरा करना पसंद करोगी?’ और मां का जवाब है, ‘तेरे लिए चार रोटियां सेंक जाऊंगी ताकि तू भूखा न सोये।’

लगे हाथ हम एक और देवी को याद कर लें जिन्होंने करोड़ों लोगों के जीवन को सुख और सुकून से भर दिया। ये देवी लता मंगेशकर थीं जो आज भी करोड़ों लोगों के कानों में अमृत टपकाती रहती हैं। सदियां गुज़र जाएंगीं लेकिन लता हमारे बीच में रहेंगीं। वे हमेशा हमारे दुःख-सुख में हमारे बगल में खड़ी रहेंगीं। हमारी देवियों की तरह लता जी भी अमर हो गयीं।

आदि शंकराचार्य ने कभी नारी को ‘नरक का द्वार’ कहा था। भाष्यकारों ने समझाया कि उनका आशय यह था कि स्त्री का संसर्ग साधकों में वासना को जागृत करता है, उसे मोक्ष-प्राप्ति के मार्ग से विचलित करता है। यहां बड़ा सवाल यह उठता है कि संन्यासी को इंद्रयजित कहा जाता है, यानी ऐसा व्यक्ति जिसने इंद्रियों पर विजय पा ली हो। फिर साधक के विचलन की गुंजाइश कहां रह जाती है? अर्थ यह निकलता है कि साधक को अपने ऊपर भरोसा नहीं होता, इसीलिए वह स्त्री से दूर भागता है। यानी रोग कहीं और है और दवा कहीं और लगायी जाती है। नारी सृष्टि में पुरुष की पूरक है, उसके बिना सृष्टि की कल्पना असंभव है। सृष्टि के परिचालन का जितना बोझ स्त्री के हिस्से में आता है उसका सौवां अंश भी पुरुष के हिस्से में नहीं आता। इसके बावजूद भी पुरुष स्त्री को अपमानित करने का कोई मौका नहीं चूकना चाहता।

इस प्रसंग में परसाई जी की एक बहुत दिलचस्प रचना ‘राग विराग’ याद आती है। बस यात्रा का वर्णन है। बस में दो-दो की सीटें हैं। एक पर एक सन्यासी विराजते हैं, 40-50 की उम्र। थोड़ी देर में उनके बगल वाली सीट पर एक महिला बैठ जाती है। सन्यासी परेशान हो जाते हैं। स्त्री से कहीं अन्यत्र बैठने का अनुरोध करते हैं, लेकिन कोई सीट खाली नहीं है। सन्यासी कहते हैं, ‘मैं स्त्री के साथ नहीं बैठ सकता। स्त्री का संग मुझे वर्जित है।’ यह भी कहते हैं, ‘माता और पुत्री का संग भी हमारे लिए निषिद्ध है। धर्म का आदेश है।’ लेखक सन्यासी से कहता है, ‘बैठ जाने दीजिए। आप तो वीतराग हैं।’

बस चल पड़ती है और थोड़ी देर बाद स्त्री परेशान होने लगती है। सन्यासी जी जो श्लोक पढ़ रहे थे वे गड़बड़ाने लगते हैं। स्त्री बार-बार सन्यासी से ठीक से बैठने को कहती है। अंत में वह उठकर सन्यासी जी को एक थप्पड़ मारती है, कहती है, ‘लुच्चा बदमाश कहीं का’। सिद्ध हुआ कि जो संयम मन से न होकर कृत्रिम उपायों से होता है, उसका यही हाल होता है। गांधी जी ने स्त्रियों के संसर्ग में अपने संयम की बाकायदा परीक्षा ली थी और उसमें सफल हुए थे, यद्यपि उनका यह प्रयोग विवाद का कारण भी बना था।

कई वर्ष पहले मुझे एक धार्मिक भोज में एक युवा साधु मिले थे। वे मेरे ही नगर के थे, वहीं शिक्षा प्राप्त की थी। भोजन के लिए दूर से पैदल चलकर आये थे। बात बात में उन्होंने बताया कि उन्हें स्त्रियों के साथ एक ही आसन पर बैठने से परहेज़ है। मुझे लगा उनकी दृष्टि में स्त्रियों के शरीर में कोई ‘करंट’ होता है जो आसन के मार्फ़त उन तक पहुंच कर उनकी साधना को खंडित कर देता है।

पता चला है कि स्वामी नारायण संप्रदाय के बड़े गुरु जी की उम्र 93 साल है। इस उम्र में तो वैसे ही आदमी के लिए स्त्री-पुरुष का भेद ख़त्म हो जाता है। फिर ऐसे स्त्री-विरोधी विचार क्यों?

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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जगत सिंह बिष्ट
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साधुवाद!🙏🙏🙏🙏

Kundan Singh Parihar
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धन्यवाद, बिष्ट जी।