श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “नहा आया हूँ गंगा में” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १६१ ☆

☆ नहा आया हूँ गंगा में ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

सब त्योहार तुम्हारे

बहा आया हूँ गंगा में।

 

शेष बची बस याद

किसी मन के कोने में

अर्पित होता स्वयं

अकेला रात बिछौने में

हर व्यवहार तुम्हारे

चुका आया हूँ गंगा में।

 

आँखें सोती नहीं

नींद के मारे सपने

रात चली बेरहम

भोर सिरहाने रखने

सब उपकार तुम्हारे

सिरा आया हूँ गंगा में।

 

जीते रहे सदा भ्रम

मिलकर ख़ुशियों वाले

परे हटाकर दर्द

बाँटते रहे उजाले

कर संस्कार तुम्हारे

नहा आया हूँ गंगा में।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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