सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – टूटती आशा…।
रचना संसार # ११२
☆ गीत – टूटती आशा… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆
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नित्य मन को मार कर के,
और विष पी हम जिये हैं,
शूल राहों में बिछे पर,
घाव अपनों ने दिये हैं।।
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टूटती आशा कड़ी सब
साँस भी बंधक बनी है।
घुट रहा है दम धुँए से,
मौत से अपनी ठनी है।।
लीलता अजगर दुखों का,
वेदना हिय में घनी है।
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टाट का बिस्तर जला सब,
वारुणी जी भर पिये हैं।।
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उड़ गया है प्रीति -पंछी,
छटपटाता है शिकारी।
वासना का जाल जकड़ा,
कर्म गीता देख हारी।।
दाँव पर पत्नी लगाते,
बैठ कर पागल जुआरी।
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है छलावा हर कदम पर,
ओंठ दुष्टों ने सिये हैं।।
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दे रहा है जग चुनौती,
रूठती भी है प्रभाती।
है अँधेरा भी घनेरा,
ये अमावश भी सताती।।
तामसी हैं नृत्य करते,
रोशनी आँखें चुराती।
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जूगनू भी करते शरारत,
आस के बुझते दिये हैं।
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दोष किसका है कहें क्या,
मौन बैठे हैं सितारे।
आसुरी माया बढ़ी है,
घात करते हैं सहारे।।
है छलावा हर कदम पर,
सत्य निष्ठा भी पुकारे।
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हाशिए पर हम खड़े हैं,
संग आकुल उर लिये हैं।।
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© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)
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