डॉ.राजेश ठाकुर
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “तो जानें…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४६
कविता – मैं… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
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मैं क्या हूँ मुझे आईना दिखाइये जनाब
औक़ात मेरी मुझको तुम, बताइए जनाब
=2=
दूजों पे नुस्ख़ ढूँढ़ने का ऐब है मुझमें
निज गिरेबाँ में झाँकूँ ये सिखाइए जनाब
=3=
शिकवे-गिले तमाम का हिसाब मांगिए
अब ऐसा मज़ा मुझको तुम चखाइए जनाब
=4=
कुछ तो फ़ायदा हो आने वाली नस्ल को
मुझसे वसीयत में ये लिखाइये जनाब
=5=
‘ राजेश ‘ कब क्या कह गया ख़याल ये रहे,
शेर मेरे मुझको ही सुनाइए जनाब
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© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
शासकीय कॉलेज़ केवलारी
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