श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “मायाजाल…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २८१ ☆

☆ # “मायाजाल…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

☆

रिश्तों का मायाजाल

 हर तरफ फैला है

उजले उजले चेहरें है

पर मन मैला है

 

वह साथ-साथ है

पास पास है

हर कदम पर

हमारे लिए खास है

वह सांसों में बसता है

हथेलियां पर

रंगो सा रचता है

उसे अपने खून पसीने से सींचा है

दुःख दर्द में अपने सीने से भींचा है

ओस की बूंदों की तरह पाला है

पेट काटकर उसे खिलाया निवाला है

बुलंदियों पर पहुंचाने हर कष्ट झेला है

आज उसके जीवन में खुशियों का मेला है

रुतबा है मान है सम्मान है

समाज में प्रतिष्ठित इंसान है

 

और

उसे यहां तक पहुंचाने वाला

हर पल संभालने वाला

जीवन के आखिरी पड़ाव पर

जीर्ण हो चुकी नाव पर

बैठा अकेला है

निरर्थक यह रिश्तों का मेला है

उसे चिंताओं ने घेरा है

उसके आगे अंधेरा ही अंधेरा है

जब रिश्तें टूटते हैं

तो आंख भर आती है

हृदय को भावविह्वल कर जाती है

 

रिश्ते भी कितने अजीब है

जिनका सहारा है

वह खुशनसीब है

 

जीवन भर आदमी

 अपने कंधों पर

रिश्तों को ढोता है

आखिरी पड़ाव पर

टूटते रिश्तें देखकर

चुपचाप रोते रोते

दुनिया से विदा होता है /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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