स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – ठंडे ये ज्वालामुखी करो…२।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # ३०२ ☆
☆ – ठंडे ये ज्वालामुखी करो…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
बहुत दूर
दिख रही है फसल
धरा उर्वरा श्यामल ।
कोई देता है आश्वासन-
‘तुम्हें कल मिलेगा जल
और परसों काट लेना
सारी की सारी फसल ‘
कोई यक्ष आकर कहता है
हकीकत भरे ख्वाब में
पहले मेरे प्रश्नों के उत्तर दो-
तब पानी पीना तालाब में-
हाय !
सारा ज्ञान हो गया व्यर्थ
हम कितने असमर्थ
समझ नहीं पाये प्रश्नों के अर्थ ।
हे यक्ष महाराज
न हों नाराज
एक सवाल मैं भी पूछूं
यदि बुरा न लगे आपको
सौ वर्ष में पूरी होने वाली
योजना से
क्या लाभ होगा मुझको
या मेरे बाप को?
माना कि आप
लाभ पहुँचाएगें
हमारे नाती के परनाती को
लेकिन हम तो तरस रहे हैं
चने को, चपाती को ।
आखिर हम कब तक
उकसाते रहेंगे
बिना तेल वाले दिये की जोत को
मंहगाई के महाभारत में
क्रमशः…
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




