श्री संतोष नेमा “संतोष”
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है – संतोष के दोहे – पितृ पक्ष…। आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३२१ ☆
☆ संतोष के दोहे – पितृ पक्ष… ☆ श्री संतोष नेमा ☆
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पितरों को सादर नमन, वंदन शत शत बार
सदा आप ही हमारे, जीवन का आधार
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तुम बिन सूना सा लगे, यह अपना घर द्वार
कोई देता है कहाँ, तुम सा लाड़ प्यार
तर्पण पितरों का करें, सदा प्रेम से आप
श्रद्धा से ही श्राद्ध है, हरती भव के ताप
जिनके पुण्य प्रताप से, जीवन में उल्लास
उनके ही आशीष से, रिद्धि सिद्धि का वास
पुण्य कर्म से सुधरता, अपना ही परलोक
करनी ऐसी कर चलो, घर में हो आलोक
आना जाना है लगा,यह जीवन का सार
अपने कर्मों से मिले,जीवन में सत्कार
पितृ भक्ति से सदा ही,जीवन सफल महान
पित्र चरण की धूल को,पूजे सकल जहान
ईश्वर के अस्तित्व का,हो जिनसे अहसास
धन्य धन्य वो लोग हैं, रहें पिता के पास
पितरों के आशीष से,जीवन में “संतोष”
सांची सेवा से बढ़े, सुखद शांति का कोष
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© संतोष कुमार नेमा “संतोष”
वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार
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