श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “भूख की आग…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २८४ ☆

☆ # “भूख की आग…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

☆

मैं जीवन भर

अंधेरे में पलता रहा

मैं दुनिया के

आंडबरों से छलता रहा

जिव्हा भी मेरी काट दी गई

मैं जीते जी

पल पल जलता रहा

 

निकलने की कोई

राह नहीं थी

ऐसा नहीं कि कोई

चाह नहीं थी

भेदभाव का

फैला था अंधेरा

थामने के लिए

कोई बांह नहीं थी

 

अन्न के दाने-दाने के

लाले पड़े थे

गोदामों पर अमीरों के

ताले जड़े थे

भूखे प्यासे

तपती धूप में हम

हाथ पसारे

 लाईन में खड़े थे

 

आंखों में कुछ

 दम तोड़ते सपने थे

आजू-बाजू में निराश

सब अपने थे

भूख नागिन बन

डस रही थी

भूख से कमजोर शरीर

लगे तपने थे

 

यह रोटी और भूख का द्वंद्व

कब तक चलेगा ?

यह बेरहम समाज

हमको कब तक छलेगा ?

कहीं भूख की आग

शोला ना बन जाए

उस आग में समाज

फिर ना जाने कब तक जलेगा ?

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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