सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ आलेख ☆ “चिनारों की चित्रकारी- लाल पीली सुनहरी” ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

कभी मैंने पारिजात के लिये लिखा था—अवसान भी हो मधुरतम

यही पंक्तियां मैं लासानी चिनारों को अर्पित कर रही हूँ। शरद ऋतु का सिंगार करती, उसके मसृण स्वभाव से मेल खाती, चिनार से झरती हुई पत्तियां लाल पीली  सिन्दूरी, भूरी ,सुनहरी , सूर्य किरणों के झरने में नहाती,मिट्टी के परस से रोमांचित होती, नर्म कोमल हवाओं की बाँहों में बाँहें डाले सौंदर्य का स्वर्ग रचती हैं।

कितनी अजीब है प्रकृति बहारों में दीवाना बनाती है और पतझड़ में दार्शनिक रूप से मोह लेती है।

शाखों से झरने का, अलग होने का  दर्द इन पत्तियों के अलावा और कौन समझ सकता है।वे नहीं जानतीं कि लोग उनकी पीड़ा में भी आसक्ति ढूँढ लेते हैं।रूहानी सुकून महसूसते हैं।

जिन्दगी स्वयं को कभी नहीं दोहराती।दोहराव में भी नयापन होता है।जैसे इस खूबसूरत मंज़र को यादों में जिन्दगी मिलती है।जिसे मन की आँखें अपने एलबम में सहेज लेती हैं।

वन में रूप की ज्वाला केवल पलाश ही नहीं भड़काते, चिनारों को भी यह श्रेय दिया जाना चाहिए।

बेहद तकलीफ होती है यह देखकर कि जिन रंगीन पत्तों का राशिभूत सौंदर्य काबू में करने के लिए पर्यटकों के कैमरे निकल आते हैं उन्हीं पत्तों को कुछ कश्मीरी ठंड भगाने के लिए जला देते हैं।

बर्फानी ठंड के लिए रूपरेखा बनाती हुई  कश्मीर की वादी पत्तों की खामोशी का तर्जुमा कर नहीं पाती। ऐश्वर्य दिखाने के नाम पर मिट्टी को सौंप देती है। बेरहम ।

किसी शायर ने क्या खूब कहा है—-

उदासी रूह से गुजरी है

इस तरह जैसे

उजाड़ दश्त में पतझड़ की

दोपहर तन्हा।।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

8/11/25

नागपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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Chhaya saxena

बहुत सुंदर, पूरा जीवंत चित्रण👏👏👏👏👏👏👏