श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आप किस मिट्टी के बने हैं।)

?अभी अभी # ९९२ ⇒ आलेख – आप किस मिट्टी के बने हैं ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

माना कि इंसान हाड़ मांस का पुतला है, लेकिन जब तक इस तन में सांस है, तब तक ही जीता जागता वन पीस है, बाद में तो इस मिट्टी में मिल ही जाना है। व्हाट्सएप ज्ञान की तरह ही कुछ ज्ञान इल्मी भी होता है, और कुछ फिल्मी भी। इल्म और फिल्म का जब कॉकटेल बनता है, तब यह कहा जाता है ;

माटी के पुतले

इतना ना कर तू गुमान

पल भर का तू मेहमान …

मतलब इस माटी के पुतले को वापस मिट्टी में ही मिल जाना है। यह शरीर ही तो हमारा घर है। यानी घर भी मिट्टी का और यह शरीर भी मिट्टी का। घर बनाते समय तो हम बढ़िया बिल्डिंग मटेरियल लगाते हैं। छांट छांटकर बढ़िया गारा, ईंट, मिट्टी, सरिया और सीमेंट लाते हैं। कहीं सागौन की लकड़ी तो कहीं शीशम के दरवाज़े। बढ़िया फर्नीचर और बढ़िया कांच का सामान। इंटीरियर पर कितना खर्च करते हैं। मकान कहां जिंदगी में बार बार बनता है। इसलिए जिंदगी भर की कमाई हमने शानदार मकान में लगाई।।

और हमारा यह शरीर किस मिट्टी का बना है, कभी सोचा है। जब हमारा शरीर बन रहा था, तब तो हम आराम से सो रहे थे अथवा रो रहे थे, हमें कुछ नहीं पता। जिस तरह मिट्टी को तराशा जाकर, कुम्हार द्वारा, उसे कोई आकार दिया जाता है, वैसे ही हमें भी एक आकार मिला। किस शक्ति ने हममें प्राण फूंके, हमें पता नहीं। लेकिन हम जब पैदा हुए तब किसी की गोद में, हाथ पांव मारते हुए कभी किलकारी मार रहे थे, तो कभी रो रहे थे।

एक पानी के मटके को देखकर आप भले ही यह अंदाज लगा लें कि वह किस मिट्टी का बना है, लाल अथवा काली मिट्टी का। एक मटके में भले ही जान ना हो, लेकिन जब उस मटके का ठंडा पानी, हलक से नीचे उतरता है, तो ऐसा महसूस होता है मानो किसी ने शरीर में प्राण फूंक दिए हों। जल ही जीवन है।।

अगर किसी माटी के घड़े ने रत्ती भर भी यह गुमान कर लिया कि कुम्हार ने जैसा मुझे घढ़ा है और जिस मिट्टी से घढ़ा है, उससे बेहतर कोई मिट्टी नहीं और उससे बढ़िया कोई घड़ा नहीं, तो घड़े में सिर्फ एक छेद ही काफी है उसके अहंकार को पानी पानी करने के लिए। एक कंकर से मटकी फूट जाती है, और घड़े की किस्मत भी फूट जाती है। जल्द ही उसे परंडे से बेदखल कर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।

माटी के इस पुतले पर इतना गुमान ठीक नहीं। हम सब एक ही मिट्टी के घड़े हैं। हमारा कुम्हार कोई छोटा मोटा कुम्हार नहीं, उसने पूरी दुनिया बनाई है। अलग मिट्टी के मुगालते मत पाल हे जीव !

उसी मिट्टी से उसने कीड़े मकोड़े बनाए हैं, बस शुक्र मना उस कुम्हार का, जिसने तुझे जीता जागता माटी का पुतला बना डाला। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, हम सब एक ही माटी के पुतले हैं। वही मिट्टी तो हमारी भारत माता है। उसका हमारा जन्म जन्मांतरों का नाता है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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