श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखका व कवयित्री अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।
☆ आलेख ☆ || देखो शिव सावन आ गया || ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆
साइकोलोजी की पढ़ाई करते हुए कभी सोचा ही नहींं, बस मुट्ठी भर ख्वाब लिए तरक्की के लिए बढती रही। उम्र के साथ साथ माँ की थपकी ना जाने कब हिदायत में बदल गई और कपड़ों का पहनावा समाजिक सम्मान से जुड़ गया मालूम ना चला।
गणित कमज़ोर रहा अतः दुनियाँदारी में हमेशा ठगी गई फिर भी साइकोलोजी की पढ़ाई पूरी हूई और नाते रिश्तेदारों में फुसफुसाहट होने लगा बिटिया सयानी हो गई फिर देरी कहाँ हुई और पिता जी ने थमा दिया हाथ पिया के देहरी से।
अजीब है न ! स्त्री अर्धांगिनी बनते ही पूर्णता दर्शाने की कोशिश करने के लिए कदम ताल मिलाने की भरपूर कोशिश करतीं हैं और पुरुष समाज यह समझ लेता है कि स्त्री उसका अधिपत्य है।
मकान से घर और घर से पिहर – माया का के बीचों बीच फंसी स्त्री मन हमेशा कोशिश करता रहा कि उसके घर की खिड़की दरवाजे भले लकड़ी के हो लेकिन उसके जीवन साथी का हृदय विस्थापित जंगल हो जहाँ उसके लिए कोई रोक टोक ना हो बिल्कुल माता पार्वती जी के जैसे वह केवल अपने शिव रुपी पति की संगनी रहना चाहतीं है उसके लिए सम्पति तो केवल उसका पति होता है।
अनगिनत भ्रम में जीवित रहतीं स्त्रियाँ केवल ऊपरी सतह के परतों में लिप्त हाथों में हरी – हरी चुड़ियाँ डालकर कहती है –
शिव का सावन आ गया जबकि सच्चाई तो यह है कि उनके मन के अंदर एक घुटन ढूढ़ती हैं एक विस्थापित जंगल जिस जंगल में वह अपने शिव के साथ बैठीं केवल शिवमय होकर अनंत में मिलने से पहले खिल खिलाकर बोले –
“देखो शिव सावन आ गया”
~ अभिव्यक्ति की स्याही ~
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© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव
गोरखपुर, उत्तरप्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




