श्री यशोवर्धन पाठक
☆ “बुंदेली के सुप्रसिद्ध साहित्यकार – डा. पूरनचन्द जी श्रीवास्तव” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆
किसी भी विषय पर कोई लेखन अगर उससे संबंधित क्षेत्रीय भाषाओं में किया जाता है तो उसकी सार्थकता और उपयोगिता दोनों ही बढ़ जाती है। हिन्दी साहित्य में ऐसा ही सार्थक सृजन सुप्रसिद्ध साहित्यकार और शिक्षाविद डा. पूरनचन्द जी श्रीवास्तव का भी रहा है। वैसे तो उन्होंने हिन्दी और अंग्रेजी भाषा दोनों ही में अत्यंत ज्ञानवर्धक लेखन किया लेकिन बुंदेली भाषा में किये गये साहित्य सृजन के लिए वे अपेक्षाकृत अधिक चर्चित रहे। बुंदेली भाषा में किया गया उनका सृजन बुंदेलखंड के क्षेत्रों में पठनीय और लोकप्रिय दोनों ही सिद्ध हुआ। डा. पूरनचन्द जी श्रीवास्तव द्वारा बुंदेली भाषा में रचा गया वीरांगना रानी दुर्गावती पर आधारित खंड काव्य साहित्यिक क्षेत्र में एक ऐतिहासिक दस्तावेज भी माना जाता है। इस संबंध में सुप्रसिद्ध साहित्यकार डा. गार्गीशरण मिश्रा मराल ने अपने एक लेख में लिखा है कि डा. पूरनचन्द श्रीवास्तव एक सिद्धहस्त साहित्यकार हैं। उनकी अनेक कृतियां- साहित्य खड़ी बोलीं में है किन्तु वीरांगना रानी दुर्गावती खंड काव्य बुंदेली भाषा में है। संभवतः बुंदेलखंड की वीरांगना रानी दुर्गावती का यशोगान बुंदेली भाषा में करना कवि को अधिक समीचीन लगा होगा ताकि बुंदेलखंड की जनता अपनी ही भाषा में महिमा मंडित रानी दुर्गावती की वीरगाथा सुनकर आल्हादित हो। सकें। कवि डा. पूरनचन्द श्रीवास्तव ने बुंदेली जैसी लोक भाषा को काव्य भाषा का रुप देकर उसे कलात्मक सौंदर्य प्रदान किया है। श्रीवास्तव जी ने वीरांगना रानी दुर्गावती की महिमा का जो यशोगान बुंदेली भाषा में किया है, वह अत्यंत प्रभावी और पठनीय है। एक जगह वे लिखते हैं –
चली प्रलय से जूझन रानी, रणचंडी अकुलाई।
गंगा – जमुन उत उठीं हिलोरें, इत रेवा उमड़ाई।
डा. पूरनचन्द श्रीवास्तव जी का मानना था कि बुंदेली भाषा के विकास और प्रचार के लिए यह जरूरी है कि इसका दैनिक जीवन में अधिकाधिक उपयोग किया जाये और इसे बोलने में हम गर्व महसूस करें। एक बार साहित्यकार एवं शिक्षाविद श्री अभय तिवारी जी से साक्षात्कार के दौरान उन्होंने कहा था कि- “आज हमें जरुरत ए की है कि मुहावरों और लोकोक्तियो खों आगे लायें। ओमें लोगन के बीच में जो कहनातें हैं ऊखों आगे लायें।”
पितृ तुल्य डा. पूरनचन्द जी श्रीवास्तव मेरे पूज्य पिता स्व. पं. भगवती प्रसाद जी पाठक के अत्यंत आत्मीय मित्र थे। इसी के साथ वे मेरे अग्रज स्व. श्री हर्षवर्धन जी पाठक के गुरु भी थे। पारिवारिक आत्मीयता होने के कारण मैं भी उन्हें श्रद्धा से चाचा जी के रुप में संबोधित और सम्मानित करता। चूंकि उनका निवास मेरे गलगला स्थित निवास के समीप था, इसलिए प्रायः रविवार को श्रीवास्तव जी मेरे घर आते और फिर चाय नाश्ता करके पिताजी के साथ पास ही सब्जी खरीदने बाजार जाते। घर पर मैं दोनों की बौद्धिक चर्चाओं को बड़े ध्यान से सुना करता। इस दौरान मैंने अनेक बार श्रद्धेय श्रीवास्तव जी की ओज और मस्ती का साक्षात्कार किया है। घर पर जब वे बुंदेली कविताएं सुनाते तो हम सब उन्हें घेर कर बैठ जाया करते।
यह उल्लेखनीय है कि डा . पूरनचन्द श्रीवास्तव देश के हिन्दी साहित्य और बुंदेली लोक साहित्य के प्रतिष्ठित विद्वान थे। उनका जन्म 1 सितंबर 1916 को कटनी के ग्राम पिपरहटा में। हुआ था। शिक्षा तो उन्होंने नागपुर और जबलपुर में प्राप्त की लेकिन कर्म क्षेत्र उनका जबलपुर रहा। हितकारिणी महाविद्यालय में अपने शिक्षकीय दायित्वों का निर्वाह करते हुए श्रीवास्तव जी 1976 में सेवानिवृत्त हुए। बुंदेली भाषा और साहित्य में उनके सक्रिय योगदान के कारण ही अनेक वर्षों से गुंजन कला सदन विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं के साथ बुंदेली दिवस के रूप में उनके जन्म दिवस का व्यापक आयोजन करती आ रही है और मेरे विचार से बुंदेली दिवस के रूप में याद करना ही उनके प्रति हमारा सच्चा श्रद्धा भाव है।
ऐसे प्रेरणास्रोत और प्रणम्य साहित्यकार और शिक्षाविद डा. पूरनचन्द श्रीवास्तव जी के विषय में शायद किसी कवि ने सही लिखा है –
आदमी के, प्यार के, संघर्ष के
जो गीत गाए।
जियेंगी सदियां उन्हें दिन रात,
छाती से लगाए।।
© श्री यशोवर्धन पाठक
पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






