श्री जगत सिंह बिष्ट
(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)
🌱 मेरी विरासत : एक अनन्त संवाद 🌷
हर व्यक्ति अपने भीतर एक अदृश्य संसार लिये चलता है—विचारों, अनुभवों, मूल्यों और संवेदनाओं का ऐसा उत्तराधिकार जो हमारे जीवन-मार्ग को चुपचाप दिशा देता है। मेरी अपनी विरासत किसी एक नाम या किसी सीमित परम्परा की नहीं। यह एक बहती हुई धारा है, जो सदियों के शान्त आत्मचिन्तन से उपजी है—ऐसी पंक्तियों में व्यक्त, जो आदेशों जैसी नहीं, बल्कि भीतर छिपे सत्य का स्नेहिल भान कराती हैं।
मेरे लिये इस विरासत का मूल बहुत सरल है—
🌱 “अहं ब्रह्मास्मि – मैं उसी अनन्त सत्ता का अंश हूँ।”
🌱 “तत्त्वमसि – और तुम भी वही हो।”
ये वाक्य मेरे भीतर यही कहते हैं कि मेरी और संसार की सीमाएँ उतनी ठोस नहीं जितनी दिखती हैं। जो मुझमें है, वही तुममें है; जो तुममें है, वही समस्त सृष्टि में स्पंदित है।
जीवन को लेकर मेरा दृष्टिकोण भी इसी सरलता में उतर आता है—
🌱 “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन…”
अर्थात, मनुष्य केवल अपने कर्म का चयन कर सकता है, पर फल पर अधिकार नहीं रख सकता।
यह विचार मुझे हर स्थिति में संतुलित रखता है। बस अपना श्रेष्ठ प्रयास करते रहो—बाक़ी जीवन की लय पर छोड़ दो। अपेक्षा कम हो तो मन हल्का रहता है।
इसी समझ से एक सहज करुणा जन्म लेती है—अपने लिये नहीं, सबके लिये। मेरे भीतर हमेशा इन शुभकामनाओं की ध्वनि गूंजती है:
🌱 “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः…”
सब सुखी हों, सब रोग-शोक से मुक्त हों।
🌱 “सर्वेषां स्वस्तिर् भवतु, सर्वेषां शान्तिर् भवतु…”
सबके लिये कल्याण हो, सबके लिये शान्ति हो।
ये केवल प्रार्थनाएँ नहीं; यह वह संवेदना है जो किसी एक समुदाय या समूह की नहीं होती—यह मनुष्य होने की सामूहिक विरासत है। हम सभी एक-दूसरे के सुख-दुःख से जुड़े हुए हैं।
इसी क्रम में एक गहरी और व्यापक प्रार्थना भी मेरे मन को छूती है:
🌱 “ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥”
इसका सरल अर्थ है—यह भी पूर्ण है, वह भी पूर्ण है; पूर्ण से पूर्ण ही उत्पन्न होता है; पूर्ण में से पूर्ण निकाल भी लो तो भी पूर्ण ही शेष रहता है।
यह पंक्तियाँ हमें समग्रता का बोध कराती हैं—कि सृष्टि की नींव कमी नहीं, बल्कि पूर्णता है। जीवन तब सहज हो जाता है जब हम अपने भीतर और बाहर इसी पूर्णता को पहचानने लगते हैं।
मेरी विरासत मुझे यह भी सिखाती है कि ज्ञान कभी एक-रूपी नहीं होता:
🌱 “एकं सत्यं, विप्राः बहुधा वदन्ति।”
सत्य एक है, पर उसकी अभिव्यक्ति अनेक रूपों में हो सकती है।
यह विचार मन को ख़ुला रखता है—सुनने, सीखने और समझने के लिये। कोई भी ज्ञान अंतिम नहीं, और कोई भी मार्ग अकेला नहीं।
और फिर वह अनादि-प्रार्थना, जो हर खोजी हृदय की धुन है—
🌱 “असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय…”
असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अज्ञान के अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।
यह जीवन के उस शाश्वत प्रयत्न का स्वर है—साफ़ देखने, स्पष्ट सोचने और भीतर के आलोक तक पहुँचने का।
इस संवाद की शुरुआत क्यों?
मेरा प्रयास किसी विचार-धारा की तुलना करना या किसी मत को परिभाषित करना नहीं है। यह सिर्फ़ एक विनम्र कोशिश है—उस सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर को समझने की, जिसने मुझे भीतर से आकार दिया है।
मैं इसे इसलिए साझा कर रहा हूँ, क्योंकि विरासत कोई स्थिर वस्तु नहीं—यह एक जीवित संवाद है। जब हम विचार करते हैं, प्रश्न पूछते हैं, अनुभव बाँटते हैं, तो यह और समृद्ध होती जाती है।
इसी आशा के साथ यह यात्रा आरम्भ की है—अनन्त, मुक्त और सतत्—जहाँ हर व्यक्ति अपनी बात जोड़ सकता है, और हम सब मिलकर अपने भीतर की रोशनी को थोड़ा और स्पष्ट कर सकते हैं।
© श्री जगत सिंह बिष्ट
साधक
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≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈






