सुश्री इन्दिरा किसलय
☆ आलेख ☆ विवाह संस्था का दरकता स्थापत्य–शिलांग प्रकरण ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆
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विगत कुछ वर्षों से सामाजिक संरचना में होनेवाले भयावह परिवर्तन दहशतनाक दृश्य उपस्थित कर रहे हैं। विकराल आसन्न संकट की
सूचना दे रहे हैं। जो स्त्री पुरुष संबंधों में दरकते विश्वास, प्रेम में धोखा, विकृत मानसिकता,माता-पिता की रूढ़िवादी सोच तथा सूचना संचार क्रान्ति से उपजी विस्फोटक स्थिति का तस्करा करती हैं।
कहने की जरूरत नहीं कि सदियों से सताई गयी असूर्यपश्या स्त्रियों के लिये शिक्षा और आत्मनिर्भरता के साथ उजालों की व्यवस्था की गयी ताकि वे इस आलोक मैं अपने वजूद को पहचान सकें।
स्त्री पैदा नहीं होती बना दी जाती है — सिमोन द बोउआर के शब्दों का मर्म समझे। अपने दोयम दर्जे से मुक्त हो। उसे एक इन्सान की तरह जीने की सुविधा मिले।
इस विचारधारा के साइड इफेक्ट के रूप में एक ऐसा वर्ग उदित हुआ जो वीमेंस लिब के नाम पर स्वच्छन्दता और स्वैराचार का हिमायती हो गया। ऐसी में कितने ही अप्रिय और भीषण दृश्य सामने आने लगे।
ड्रग्स,ड्रिंक्स, स्मोकिंग ,मुक्त यौन संबंधों के चलते असंस्कृत प्रकरण समाज को दहलाने लगे।
सूक्ष्मवस्त्रधारिणी स्त्रियों ने स्लोगन दिया–मैं जो चाहे करूं मेरी मर्जी। वे स्टैंड अप काॅमेडी में अश्लील गालियां देती हुई पाई जा रही हैं।
ओ टी टी प्लेटफार्म पर प्रस्तुत, विकृत फिल्में हिंसा यौनाचार से जनता को उत्तेजित करती हैं। निर्माताओं को धन उगाहना है। देश जाये भाड़ में। सेंसर बोर्ड यानी बिजूका। टी वी पर क्राइम थ्रिलर भी दुष्टों को उकसाते हैं। उनकी कुत्सित सोच को खाद पानी देते हैं। स्मार्ट फोन भी पीछे नहीं। अश्लील साइट्स ने किशोरों की मानसिकता में जहर भरने का काम किया है। टीन एजर बच्चे जल्दी गिरफ्त में आते हैं। आजकल तीन साल के बच्चे को मोबाइल देने का फैशन है। कच्ची उम्र में माता पिता के मनोवैज्ञानिक ट्रीटमेंट की भारी जरूरत होती है। आधुनिकता के नाम पर निरंकुश आजादी के दुष्परिणाम समाज देख रहा है। । रेप और हत्याओं का सिलसिला इसी की परिणति है।
विश्वास ही एक ऐसी चीज है जिसके आधार पर राष्ट्र की हर इकाई, समाज परिवार और सारे रिश्ते परवान चढ़ते हैं। संस्कृति की दुहाई दी जा सकती है।
यह सारा कथानक इसलिए कि समाज का ढाँचा चरमरा रहा है। प्रेमी की मदद से पति की हत्या के प्रकरण लंबे अर्से से सुर्खियों में हैं। एक सुन्दर शिक्षित दुल्हन के रूप में कोई नागिन हत्यारिन डसने वाली है, ऐसी कल्पना भी कोई कैसे कर सकता है। मुस्कान ने प्रेमी के साथ पति के टुकड़े टुकड़े कर दिये और ड्रम में भर दिये। “—नीला ड्रम” लंबे समय तक दहशत का प्रतीक बना रहा।
और अब ताजातरीन “शिलांग प्रकरण”—इन्दौर की सोनम ने हनीमून के ख्वाब दिखाए और शिलांग में अपने पति राज रघुवंशी की हत्या करवाई। हैरानी है कि जो लड़की 20 लाख की सुपारी देकर इतने जघन्य कांड को अंजाम दे सकती है वह सीधे सीधे माता पिता से शादी के लिये मना कर सकती थी या प्रेमी संग भाग सकती थी। एक बेकसूर की हत्या कर डाली। अंततः सलाखों के पीछे ही उम्र गुजारेगी। ये किस प्रजाति की स्त्रियों का उदय हो रहा है। इन्हें परिणाम का भय नहीं होता। क्या इन्हें जरा भी अंदेशा नहीं होता कि फाँसी मिलेगी या आजीवन कारावास।
एक ने तो शादी के मंडप में वरमाला हाथ में लेकर दूल्हे से कह दिया कि वह किसी और से प्यार करती है लिहाजा ये शादी नहीं कर सकती। काश वह लड़की माता पिता की इज्जत की ऐसी धज्जियां न उड़ाती। और माता पिता को बेटी के प्रेम प्रकरण की भनक न हो ऐसा तो हो नहीं सकता।
पुणे का “लिव इन “कपल भूले नहीं होंगे लोग जहां पुरुष ने स्त्री को मारकर उसके टुकड़े फ्रिज में रख दिये थे।
इन दुर्दांत घटनाओं के अलावा डिवोर्स से लेकर एलीमनी गाँठना और प्रेमी संग ऐश करने की घटनाएं भी घटित हो रही हैं।
बेंगलुरु मेरठ आगरा मुंबई कितने शहरों के नाम लिये जायें। दुष्ट महिलाएं बेखौफ हैं। इधर शादी के आकांक्षी युवाओं में खौफ छाया हुआ है। दुल्हन के रूप में यमदूती न आ जाये कहीं। खून पसीने की कमाई एलीमनी की भेंट न चढ़ जाये।
यह विवाह संस्था के स्थापत्य की ढहती हुई दीवारों की ओर इशारा है।
अधिकांश कानून स्त्रियों के पक्ष में हैं। विवाहेतर संबंधों में स्त्री को पीड़िता का दर्जा दिया गया है। दहेज प्रताड़ना के दृश्य भी विचलित करते हैं। आश्चर्यजनक हैं ऐसी खबरें कि कुछ लड़कियां खुद भारी भरकम दहेज चाहती हैं। रक्षा के लिये निर्मित कानूनों का बेजा फायदा उठा रही हैं स्त्रियां। वे अपनी नैसर्गिक छवि का जनाजा निकाल रही हैं।
माता पिता –बच्चों की परवरिश और नैतिक मूल्यों को लेकर सचेत हों और समाज में नाक कटेगी इस सड़े विचार को लेकर समाज का ही नुकसान न करें। जब बेटी हत्या करवाती है तब नाक नहीं कटती ?
संबंधों की चूलें हिल चुकी हैं। अगर वक्त रहते पारिवारिक परिवेश और बासी बेकार मान्यताओं को लेकर लोग सजग न हुये तो और भी कई गुनाह जन्म ले सकते हैं। वक्त बेशक पीछे मुड़ना नहीं जानता पर परिवार प्रणाली का पुनरीक्षण करने की महती आवश्यकता है। शिलांग हत्याकांड के सूत्र हर रिश्ते को आईना दिखा रहे हैं। कोई भी गुनाह एक दिन के विचार की परिणति नहीं होती। वह समय के साथ परिवेश से खाद पानी लेता हुआ पल्लवित होता है। तब दायित्व के निर्वाह को लेकर हर रिश्ते को कठघरे में उपस्थित किया जाना चाहिए।
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© सुश्री इंदिरा किसलय
नागपुर
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





