श्री जगत सिंह बिष्ट
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☆ परिचर्चा ☆ वरिष्ठ व्यंगकार और कथाकार डॉ कुंदन सिंह परिहार ⇒ साक्षात्कार – श्री प्रभात गोस्वामी (Box FM) ☆ प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट ☆
यह रेडियो इंटरव्यू BoxFM Radio के शो “व्यंग के रंग प्रभात के संग” का है, जिसमें मेजबान प्रभात गोस्वामी वरिष्ठ व्यंगकार और कथाकार श्री कुंदन सिंह परिहार से चर्चा कर रहे हैं। साक्षात्कार का विस्तृत सारांश (Detailed Summary) साझा करने का एक प्रयास है।
– श्री जगत सिंह बिष्ट
डॉ कुंदन सिंह परिहार
परिचय और पृष्ठभूमि:
शो की शुरुआत एक संगीतमय परिचय से होती है। कुंदन सिंह परिहार जी का जन्म 25 अप्रैल 1939 में मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के ग्राम अलीपुरा में हुआ था। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य और अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की और 1960 से लेखन कार्य शुरू किया।
साहित्यिक योगदान:
परिहार जी ने अब तक लगभग 150 कहानियां और 250 से अधिक व्यंग्य लिखे हैं। उनके 7 कथा संग्रह और 6 व्यंग्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें “अंतरात्मा का उपद्रव” और “एक रोमांटिक त्रासदी” प्रमुख हैं।
उन्हें वागेश्वरी पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।
अलीपुरा और ज्ञान चतुर्वेदी:
परिहार जी ने अपने गांव अलीपुरा का जिक्र करते हुए बताया कि डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी के उपन्यास “बारामासी” (जिसका अंग्रेजी अनुवाद ‘अलीपुरा’ नाम से आया है) ने उनके गांव को साहित्यिक जगत में अमर कर दिया है।
व्यंग्य और आलोचना की स्थिति:
इंटरव्यू के दौरान परिहार जी ने इस बात पर दुख जताया कि वर्तमान में व्यंग्य विधा में निष्पक्ष आलोचना और मूल्यांकन करने वालों की कमी है। उनके अनुसार, लेखकों को यह बताने वाला कोई नहीं है कि वे अच्छा लिख रहे हैं या बुरा, जिससे साहित्य का नुकसान हो रहा है।
पुरस्कारों की अंधी दौड़:
उन्होंने लेखकों के बीच पुरस्कारों के लिए मची होड़ की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि दूसरों के पीछे भागना, खुशामद करना और ‘जोड़-तोड़’ बैठाना लेखक की मौलिक क्षमता को खत्म कर देता है। अगर पुरस्कार जुगाड़ से मिलता है, तो वह लेखन के लिए घातक है।
समापन:
प्रभात गोस्वामी ने परिहार जी के विचारों की सराहना करते हुए कहा कि उनके अनुभवों से व्यंग्य विमर्श को नई मजबूती मिली है।
इस चर्चा को देखने के लिए यहाँ क्लिक करें:
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© श्री जगत सिंह बिष्ट
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≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈






