डॉ. अनिल कुमार वर्मा

संक्षिप्त परिचय –

  • शिक्षा : पीएचडी (वास्तु शास्त्र), बी.टेक., एफआईई, एफआईवी, चार्टर्ड इंजीनियर,
  • सम्प्रत्ति : वास्तु/जियोपैथिक स्ट्रेस सलाहकार, प्रॉपर्टी मूल्यांकनकर्ता, पूर्व फैकल्टी, कृषि अभियांत्रिकी कॉलेज, जेएनकेवीवी, जबलपुर, पूर्व चीफ मैनेजर, एसबीआई, भोपाल सर्कल
  • विशेषज्ञता: औद्योगिक/कॉरपोरेट वास्तु एवं जियोपैथिक स्ट्रेस
  • लिखित पुस्तकें: “विजयी चुनावी वास्तु”, “Vastu For Winning Election”
  • टीवी साक्षात्कार: ज़ी बिज़नेस, ज़ी 24 छत्तीसगढ़, आईबीसी 24
  • लेख: टाइम्स ऑफ इंडिया, दैनिक भास्कर, जागरण, हरिभूमि, माय प्रॉपर्टी आदि
  • विभिन्न पुरस्कार विजेता

(ई-अभिव्यक्ति के “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से पुरानी अमूल्य और ऐतिहासिक यादें सहेजने का प्रयास है। श्री जगत सिंह बिष्ट जी (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker) के शब्दों में  “वर्तमान तो किसी न किसी रूप में इंटरनेट पर दर्ज हो रहा है। लेकिन कुछ पहले की बातें, माता पिता, दादा दादी, नाना नानी, उनके जीवनकाल से जुड़ी बातें धीमे धीमे लुप्त और विस्मृत होती जा रही हैं। इनका दस्तावेज़ समय रहते तैयार करने का दायित्व हमारा है। हमारी पीढ़ी यह कर सकती है। फिर किसी को कुछ पता नहीं होगा। सब कुछ भूल जाएंगे।”

दस्तावेज़ में ऐसी ऐतिहासिक दास्तानों को स्थान देने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है। इस शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है डॉ अनिल कुमार वर्मा जी का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ “क्रिकेट”।) 

 ☆  दस्तावेज़ # ४१ – क्रिकेट ☆ डॉ अनिल कुमार वर्मा ☆

-यह बात है सन 1957-58 की। उस समय हम लोग पुणे में रहते थे। मेरी उम्र लगभग सात–आठ वर्ष रही होगी। हमारा निवास स्थान था—ओल्ड बॉयज़ बटालियन, गणेश खिंड, औंध रोड। यह क्वार्टर मेरे पिताजी को उनके ऑफिस ARDE (आज का DRDO) से मिला था। इस कॉलोनी में ज़्यादातर लोग जबलपुर से ट्रांसफ़र होकर आए थे, क्योंकि वे पहले वहाँ की ऑर्डिनेंस फ़ैक्ट्री में कार्यरत थे। इसी वजह से यहाँ का वातावरण भी कुछ–कुछ जबलपुर जैसा ही था।

इन्हीं दिनों भारत की किसी अन्य देश के साथ टेस्ट क्रिकेट सीरीज़ चल रही थी। उसका असर यह था कि उस समय के अख़बारों में ख़बरें छपती थीं, रेडियो पर कमेंट्री आती थी और भारतीय फ़िल्म्स डिविज़न की न्यूज़रील (जो हर सिनेमा शो के पहले दिखाई जाती थी) में भी उसकी झलक मिल जाती थी। नतीजा यह हुआ कि पहले बड़े लड़कों में क्रिकेट का शौक़ जगा और फिर धीरे–धीरे वह हम छोटे बच्चों तक भी उतर आया।

जहाँ तक मुझे याद है, हमारी माताजी की मुंगरी (कपड़े पीटने का यंत्र) ही हमारा पहला बैट बनी। समस्या बॉल की थी। उस समय हमें सिर्फ़ रबर की बॉल मिल पाती थी, जबकि बड़े लड़के कॉर्क बॉल का इंतज़ाम कर लेते थे। हमारे पास वह सुविधा नहीं थी। तब हमने एक छोटा-सा इनोवेशन किया। याद नहीं कि यह आइडिया किस मित्र के दिमाग़ में आया था, मगर उस समय हमें यह बड़ा अनोखा लगा।

पिताजी की पुरानी साइकिल से निकला हुआ ट्यूब हमारे काम आया। उसे काट–काटकर हमने आधा सेंटीमीटर मोटे छल्ले बनाए। फिर कपड़े की एक पोटली बनाकर उसके ऊपर इन छल्लों को गोलाई में चढ़ाते चले गए। इस तरह हमारी एक ठोस बॉल तैयार हुई—लगभग कॉर्क बॉल जैसी!

तो मित्रों, बैट बना मुंगरी से और बॉल बनी साइकिल के ट्यूब से—और इस तरह शुरू हुआ हमारा क्रिकेट। लेकिन जल्दी ही समझ में आ गया कि मुंगरी का बैट सुविधाजनक नहीं है। उसका हैंडल काफ़ी मोटा था, जिसे पकड़ना और घुमाना हमारे छोटे हाथों के लिए कठिन था। तब हमने दूसरा जुगाड़ निकाला। मेरे स्वर्गीय मित्र प्रदीप डे (जो आगे चलकर आर्किटेक्ट बने) के पिताजी के पास लगभग 1 इंच मोटी एक पैकिंग की पटिया रखी थी। उनके घर मौजूद फरसे की मदद से हमने उसमें हैंडल तराशा और उस पर साइकिल ट्यूब का टुकड़ा चढ़ा दिया। यह नया बैट हमें काफ़ी समय तक साथ देता रहा।

बाद में हमारे गोविंद चाचा पूना आए। वे खेलों के शौक़ीन थे और अपने सेंट अलॉयसियस स्कूल में टूर्नामेंट भी करवाते थे। उन्होंने हमें लगभग 11 साल की उम्र में पहली बार असली क्रिकेट बैट दिलवाया। उस समय हमें लगा मानो कोई स्वर्ग की चिड़िया हमारे हाथ आ गई हो! हम सब बच्चों ने दिल से उनका आभार माना।

हाँ, एक बात और—हम लोग विकेट के लिए 3–4 ईंटों को एक के ऊपर एक रखकर स्टंप बना लेते थे। क्रिकेट ग्राउंड जैसी सुविधा तो थी नहीं, इसलिए मिलकर हमने एक खाली पड़ी ज़मीन से पत्थर साफ़ किए और एक पट्टी-सी पिच बना ली। लेकिन अक्सर बॉल छोटी-छोटी झाड़ियों में खो जाती थी।

हमारी टीम में एक दिन हमारी ही क्लास का साथी खेलने आया। उसने पहले कभी क्रिकेट नहीं खेला था। उसका नाम था सरदार हरभजन सिंह। हमें लगा कि यह क्या खेलेगा, इसे तो नियम भी नहीं आते होंगे। इसलिए मज़ाक में हमने उसे पहले बैटिंग दे दी। लेकिन आश्चर्य हुआ जब हमें उसे आउट करना बेहद मुश्किल हो गया! वह जैसे-तैसे बैट घुमाता और हर बार बॉल कहीं दूर जा गिरती। हमारे बॉलर्स परेशान हो गए। विकेट पर तो वैसे भी सीधी गेंद डालना हम बच्चों को कहाँ आता था! बड़ी मुश्किल से हमने उसे आउट किया।

उस दिन सरदार हरभजन सिंह ने हमारे छोटे-से “क्रिकेट साम्राज्य” का अहंकार तोड़ दिया। हमें समझ आ गया कि खेल में किसी का अनुभव ही सब कुछ नहीं होता—कभी-कभी किस्मत और प्राकृतिक टैलेंट भी चमत्कार कर जाते हैं।

♥♥♥♥

© डॉ अनिल कुमार वर्मा 

कार्यालय-सह-आवास: बंगला नंबर B 27 चौहान टाउन, जुंनवानी, भिलाई, छत्तीसगढ़ मोबाइल: 9425028600 वेबसाइट: www.askvastu.com

यूट्यूब चैनल: askvastu.com  ईमेल: vermanilg@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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