श्री जगत सिंह बिष्ट
(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)
ई-अभिव्यक्ति के “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से पुरानी अमूल्य और ऐतिहासिक यादें सहेजने का प्रयास है।
वर्तमान तो किसी न किसी रूप में इंटरनेट पर दर्ज हो रहा है। लेकिन कुछ पहले की बातें, माता पिता, दादा दादी, नाना नानी, उनके जीवनकाल से जुड़ी बातें धीमे धीमे लुप्त और विस्मृत होती जा रही हैं।
इनका दस्तावेज़ समय रहते तैयार करने का दायित्व हमारा है। हमारी पीढ़ी यह कर सकती है। फिर किसी को कुछ पता नहीं होगा। सब कुछ भूल जाएंगे।
दस्तावेज़ में ऐसी ऐतिहासिक दास्तानों को स्थान देने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है।
इस श्रृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है…
☆ दस्तावेज़ # ४६ – नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆
🪷🪷🪷🪷
एक थे बलवंत सर – धीर-गंभीर, गरिमामय व्यक्तित्व। हमारे स्कूल में अध्यापक थे। हम लोग (बच्चे) तब मैदान में खेलने जाते थे। यह उन्नीस सौ साठ और सत्तर के बीच की बात होगी।
जबलपुर के उपनगर रांझी का वो क्षेत्र अब रावण पार्क कहलाता है। यहां हजारों मकानों की अनंत श्रृंखला है। दूर ईंट के भट्ठे दिखाई देते थे, वो भी अब लुप्त हो गए हैं। स्कूल के पीछे जो खुली जगह थी, वो भी मकानों से भर गई है। आगे, मानेगांव था जहां हम छुपकर मूली उखाड़ने जाते थे। वहां भी अब मकान ही मकान हैं।
एक दिन बलवंत सर बोले, “आओ, शाखा में। वहां तुम्हारा चरित्र निर्माण और सर्वांगीण विकास होगा।” संघ की शाखा में पहली बार सूर्य नमस्कार और दंड प्रहार (डंडों का अभ्यास) सीखा। “आत्म-बोध”, “स्व-बोध की भावना”, “अहं से वयं की यात्रा”, “राष्ट्र-चेतना” और “समाज-कल्याण” की बातें तब थोड़ी-बहुत ही समझ में आती थीं। कबड्डी के खेल में अलबत्ता मज़ा आता था। अंत में प्रार्थना होती थी और “भारत माता की जय” का उद्घोष।
कालांतर में ये सब भूली-बिसरी यादें बनकर रह गईं। अभी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के शताब्दी वर्ष में एक वीडियो रिलीज़ हुआ जिसमें “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे” प्रार्थना को शंकर माधवन ने प्रभावी ढंग से गाया है और लन्दन के फिल हारमोनिक ऑर्केस्ट्रा ने संगीतबद्ध किया है। इसकी विशेषता है कि मूल प्रार्थना के साथ-साथ, उसका भावार्थ हिंदी में सहज-सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
इतने वर्षों बाद इस प्रार्थना का निहितार्थ समझ में आया। लगा, कितनी अद्भुत रचना है, कितने गहरे – कितने उच्च भाव हैं! इतनी ओजस्वी, प्रेरणादायी, भावभीनी, अर्थपूर्ण, राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत, परिष्कृत, और प्रभावशाली प्रार्थना बहुत कम ही होंगी।
इसमें समर्पण है, त्याग है, गहन आभार, प्रभु से निस्वार्थ प्रार्थना, आशा, उज्ज्वल भविष्य की कामना, पुरुषार्थ, और कुछ मूल्यवान योगदान देने की उत्कंठा है। अप्रतिम है ये प्रार्थना!
प्रार्थना का मूलपाठ संस्कृत में, भावार्थ हिंदी और अंग्रेज़ी में, और इसकी नवीनतम प्रस्तुति की यूट्यूब लिंक आपकी सुविधा, पठन, श्रवण, गहन चिंतन, और यथासंभव अनुसरण के लिए प्रस्तुत हैं:
🌱प्रार्थना:
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नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते ॥१॥
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प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता
इमे सादरं त्वां नमामो वयम्।
त्वदीयाय कार्याय बद्धा कटीयं
शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये।
अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं
सुशीलं जगद् येन नम्रं भवेत्।
श्रुतं चैव यत् कण्टकाकीर्णमार्गं
स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत् ॥२॥
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समुत्कर्षनिःश्रेयसस्यैकमुग्रं
परं साधनं नाम वीरव्रतम्।
तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा
हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्राऽनिशम्।
विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्
विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्।
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं
समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम् ॥३॥
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भारत माता की जय।
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🌱भावार्थ हिंदी में:
हे वत्सला (संतानों को स्नेह करने वाली) मातृभूमि! तुम्हें सदा नमस्कार है, तुम पावन हिंदू भूमि मेरे सुख को बढ़ाती हो। हे महामंगलमयी पुण्यभूमि! तुम्हारी रक्षा के लिए मैं अपने इस शरीर को अर्पित करता हूँ, तुम्हें बार-बार नमस्कार करता हूँ।
हे सर्वशक्तिमान प्रभु! हम इस हिंदू राष्ट्र के अंग (हिस्से) के रूप में तुम्हें सादर प्रणाम करते हैं। आपके कार्य के लिए हम कमर कसकर तैयार हैं, इस कार्य की पूर्ति के लिए हमें शुभ आशीर्वाद दीजिए। विश्व में अजेय होने वाली शक्ति, शील (सद्गुण) जिससे जगत विनम्र हो, तथा अपने द्वारा स्वीकार किए गए काँटों से भरे मार्ग को सुगम करने की क्षमता भी दीजिए।
श्रेष्ठ उत्कर्ष और निःश्रेयस (सर्वोत्तम कल्याण) का एकमात्र साधन वीरव्रत (वीरों का व्रत) है, वही हमारे अन्तःकरण में सदैव स्फुरित हो। दृढ़ ध्येय-निष्ठा हमारे हृदय में प्रज्वलित रहे। आपकी कृपा से हमारी संयुक्त कार्यशक्ति धर्म की रक्षा हेतु सक्षम हो और हमारे राष्ट्र को परम वैभव पर पहुँचाने में समर्थ हो सके।
भारत माता की जय।
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🌱Prayer:
Namaste sadaa vatsale maatribhume,
Tvaya hindubhoome sukham vardhitoham.
Mahaamangale punyabhoome tvadarthe,
Patatvesha kaayo namaste namaste.
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Prabho shaktiman hinduraashtraangbhoota,
Ime saadaram tvaam namaamo vayam.
Tvadiyaaya kaaryaaya baddha kateeyam,
Shubhaamaashisham dehi tatpurtaye.
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Ajayyaam cha vishvasya deheesha shaktim,
Sushilam jagad yena namram bhavet.
Shrutam chaiva yat kantakaakīrnamargam,
Svayam svikritam nah sugam kaarayet.
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Samutkarshanihshreyasasyaikamugram,
Param saadhanam naam veeravratam.
Tadantahsphuratvakshayaa dhyeyanishthaa,
Hridantah prajagartu teevraanishaam.
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Vijetri cha nah sanhataa kaaryashaktir,
Vidhayaasyadharmasya samrakshanam.
Param vaibhavam netumetat swaraashtram,
Samarthaa bhavatvaa shisha te bhrisham.
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Bharat mataa ki jay.
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🌱Meaning in English:
Greetings to you, O loving Motherland! You, the sacred land of Hindus, have always increased my happiness. O great and auspicious land of virtue! For your cause, I offer my very body again and again.
Almighty Lord! As members of this Hindu nation, we greet you with reverence. Our waist is girded for your work—please bless us so we may accomplish this task. Grant us strength unconquerable in the world, noble character to make the world humble, and the wisdom to make the thorny path we have chosen easier to walk.
The single, supreme and intense means for collective and ultimate well-being is the resolve of valor; let this always ignite in our hearts. May unwavering commitment to the goal be ever awake in our hearts. With your blessings, may our victorious and united workforce protect righteousness and bring our nation to the highest glory.
Victory to Mother India!
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🌱Video Link:
Artha-Sahit Sangh Prarthana – Sankrit Prarthana Reimagined
Video Details:
Title: Artha-Sahit Sangh Prarthana – Sankrit Prarthana Reimagined
Channel: siddharth shirole
Published: 2025-09-27
Length: PT7M3S (7:03)
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© जगत सिंह बिष्ट
Laughter Yoga Master Trainer
A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈




