श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक हास्य-व्यंग्य  बाल की खाल

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # 9

☆ हास्य व्यंग्य ☆ “बाल की खाल” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

शरीर में बालों के महत्व से कौन परिचित नहीं है ? मनुष्यों सहित पशु -पक्षी भी रंग – बिरंगे बालों के कारण ही प्राणी जगत में सुंदरता और आकर्षण का केंद्र बनकर सम्मान पाते हैं। पशु – पक्षियों को इसका बोध नहीं जबकि मनुष्य को इसका बोध है। संसार के सभी प्रणियों के लिए शरीर के बाल सिर्फ बाल हैं, केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जिसने बालों को दो भागों में बांट दिया है, चाहे गए बाल और अनचाहे बाल याने प्रिय और अप्रिय बाल। हम सभी को शरीर के कुछ अंगों के बाल तो बहुत पसंद हैं जबकि कुछ अंगों के बिल्कुल नापसंद। विडंबना है कि जिन बालों को हम पसंद करते हैं या जिनसे प्रेम करते हैं वे बेवफा होते हैं, ये समय के साथ कम होते जाते हैं जो हमें नापसंद हैं वे बेशर्म होते हैं।

बालों के प्रति महिलाओं व पुरुषों का प्रेम देखकर ही आज दुनिया भर में चाहने वाले बालों को झड़ने से रोकने, मोटा और मजबूत बनाने, उन्हें तरह – तरह के रंगों में रंगने के लिए अनेक प्रकार के तेल, क्रीम, साबुन, शैम्पू, डाई, दवाएं आदि उपलब्ध हैं। इसी तरह अनचाहे बेशर्म बालों से छुटकारे के लिए भी बाजार में ढेरों उत्पाद हैं। पूरी दुनिया में आदमी के बालों के रखरखाव के लिए अरबों रुपयों का कारोबार चल रहा है। यदि आदमी बालों से प्यार करना छोड़ दे तो न सिर्फ उसका तनाव घट जाए, ब्लड प्रेशर नार्मल हो जाए बल्कि पैसे भी बचें। बालों के बढ़ने, उगाने और बेशर्म बालों को खत्म करने के उत्पादों का कारोबार ठप्प हो जाए। प्रश्न यह है कि अगर ऐसा होता है तो फिर उन लड़कियों का क्या होगा जो पुरुषों की आकर्षक हेयर स्टाइल पर आहें भरते हुए दिल और जन न्यौछावर करते हुए कहती हैं –

“उड़ें जब – जब जुल्फें तेरी,

 कंवारियों का दिल मचले”

महिलाओं के बाल भी पुरुषों के आकर्षण का केंद्र हैं, वे कहते हैं –

“ये रेश्मी जुल्फें, ये शरबती आँखें,

 इन्हें देखकर जी रहे हैं सभी। “

शायरों – कवियों ने तो अच्छी जुल्फों के बिना हसीनाओं की कल्पना तक नहीं की है। हसीनाओं के जुल्फ – प्रेम पर तो एक शायर व्यंग्य करता हुआ यहां तक कहता है कि –

तेरी जुल्फें हैं या रात का साया हैं,

अगर तू सर को मुंडा ले तो सवेरा हो जाए।

खैर, सर के बालों के सौन्दर्य – प्रसंग से तो सभी भाषाओं का साहित्य भरा पड़ा है, आप भी बहुत कुछ जानते हैं। यहां मुझे याद आ रहे हैं “नाक के बाल”। चूंकि ये बाल नाक के अंदर होते हैं और वायु के कचरे को अंदर जाने से रोकते हैं अतः लोग इन्हें अनचाहे बालों की श्रेणी में नहीं रखते, बल्कि “नाक के बालों” का तो इतना सम्मान है कि चमचे किस्म के लोग महत्वपूर्ण लोगों की “नाक का बाल” बनने के लिए जी जान से लगे रहते हैं। जब किसी व्यक्ति द्वारा किसी विशिष्ट व्यक्ति की प्रशंसा, सेवा और विश्वसनीयता चरम पर पहुंच जाती है तो विशिष्ट व्यक्ति उसे बाल के रूप में अपनी नाक में स्थान प्रदान कर देता है। जब कोई व्यक्ति किसी विशिष्ट व्यक्ति की “नाक का बाल” बन जाता है तो समाज में उसकी पूंछ परख बढ़ जाती है। किसी क्षमतावान व्यक्ति की नाक का बाल होने के अनेक फायदे हैं, किंतु किसी की नाक का बाल बनना और फिर उसकी नाक में बाल के रूप में अपना स्थान बनाए रखना आसान नहीं है। मैं ऐसे अनेक लोगों को जानता हूं जो कल तक तो विशिष्ट व्यक्ति की नाक के बाल थे, किंतु जरा सी लापरवाही के कारण या तो उखाड़ दिए गए या ऐसे स्थान पर स्थानांतरित कर दिए गए जिनकी कोई कीमत नहीं है। यहां मैं अपने एक परिचित का उल्लेख अवश्य करना चाहूंगा। मैं जब भी उनके पास जाता हूं वे हमेशा मुझे अपनी नाक के बाल उखाड़ते ही मिलते हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि रोज उन्हें अपनी नाक में बाल मिल कहां से जाते हैं। आप सोच रहे होंगे कि मैने मूंछ के बालों की चर्चा नहीं की। मूंछ के बाल भी बड़े कीमती, व्यक्ति की आन – बान – शान का प्रतीक होते हैं। लोग अपनी मूंछों के सम्मान के लिए जान की बाजी तक लगा देते हैं। बालों से हमारा और हमसे बालों का इतना गहरा सम्बन्ध है कि लिखूं तो लिखता ही जाऊं, लेकिन सोचता हूं “बाल की खाल” निकालना ठीक नहीं।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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