श्री प्रतुल श्रीवास्तव
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य “नेकी कुएं में : पाप घड़े में”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २१ ☆
☆ व्यंग्य ☆ “नेकी कुएं में : पाप घड़े में” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
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लोग संसार में बढ़ते पापियों से परेशान हैं, लेकिन कहते हैं कि “भगवान के घर देर है अंधेर नहीं”। संसार में जितने भी पापी हैं सबके पाप के घड़े एक न एक दिन अवश्य ही फूटेंगे। अस्तु, जनता को परेशान होने अथवा घबराने की जरूरत नहीं है। उसे केवल पापी का घड़ा भरने का इंतजार करना है। पापी का घड़ा फूटा और उसका हिसाब हुआ।
भगवान भी बड़ा अजीब है, जिसने आदमी की पीठ पर पुण्य का घड़ा बांधने के बजाय पाप का घड़ा बांध दिया। शायद उसे यह विश्वास था कि आदमी पुण्य कार्य करेगा ही नहीं अथवा करेगा भी तो इतनी अधिक मात्रा में नहीं कि उन्हें इकट्ठा करने के लिए उसे घड़े जैसे किसी पात्र की जरूरत पड़े। आदमी के सामने बड़ी समस्या है कि नेकी के कार्य तो उसे कुएं में डाल देना पड़ते हैं और पाप घड़े में सुरक्षित रखना पड़ते हैं। यहां सोचने वाली बात यह है कि आखिर भगवान ने आदमी के साथ पाप इकट्ठे करने के लिए एक खाली घड़ा क्यों बांधा ? यदि वह आदमी को पाप करके उसे सुरक्षित रखने हेतु घड़े जैसी वस्तु नहीं देता तो आदमी पाप करता ही क्यों और यदि पाप करता भी तो घड़ा न होने के कारण उसे छिपा न पता, उसका पाप फौरन लोगों के सामने आ जाता।
अब चूंकि सबके पास पाप इकट्ठे करने एक – एक घड़ा है और हर घड़ा मालिक यह जानता है कि भगवान द्वारा निर्मित यह विशेष घड़ा जब तक पूरा न भरे तब तक इसके टूटने – फूटने का कोई खतरा नहीं है। अतः लोग बेहिचक हत्या, बलात्कार, चोरी, डकैती, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी जैसे संगीन पाप करके उन्हें घड़े में भरते जाते हैं, क्योंकि आदमी के पास बुद्धि नाम की चीज भी है अतः कुछ लोग बीच – बीच में अपने पाप के घड़े की स्थिति देखते रहते हैं और चतुराई पूर्वक पाप इस गति से करते हैं कि घड़ा भर कर फूट न जाए। वे घड़ा भरने से पूर्व ही पाप करना छोड़ कर सभ्य बन जाते हैं और पूर्व के पापों की कमाई खाते हुए चैन से जीवन गुजारते हैं। भाइयो यदि समाज में सुरक्षित और सम्मानित बने रहना चाहते हैं तो घड़े पर नजर रखते हुए पाप करें, उसके भरने के पूर्व पापों से तौबा कर लें। कहावत है कि सौ चूहा खाने के बाद बिल्ली हज को चली जाती है। शायद बिल्ली के घड़े की पाप ग्रहण क्षमता सौ चूहों की हत्या है। इसीलिए चतुर बिल्ली एक सौ एकवाँ चूहा नहीं मारती।
पाप पुण्य की बातें तो इतनी हैं कि लिखना शुरू कर दें तो पुथन्ना बन जाए, किंतु यहां मैं केवल इतना कहना चाहता हूं कि जब कुछ लोगों ने अपने बुद्धिबल से लोगों को चांद पर पहुंचा दिया है और कुछ ने आध्यात्म बल से ईश्वर से साक्षात्कार कर लिया है तो उन्हें चाहिए कि वे अपने विज्ञान, तकनीक अथवा ईश्वरीय समीप्य का उपयोग करते हुए इस बात की कोशिश करें कि भगवान द्वारा आदमी के साथ भेजा जाने वाला पाप का खाली घड़ा उसका पिंड छोड़ दे, क्योंकि ” न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।”
यदि दुनिया के वैज्ञानिक, तकनीशियन और ईश्वर के मित्र (धर्मगुरु, आचार्य, महर्षि और जमीन के भगवान) प्रयास पूर्वक आदमी को घड़े की झंझट से मुक्त नहीं करवा सकते तो कम से कम उन्हें यह जानने की कोशिश करना चाहिए कि भगवान द्वारा प्रदत्त पाप का घड़ा किस धातु अथवा मिट्टी का बना रहता है ताकि उसे नष्ट करने का प्रयास किया जा सके। यदि हम यह नहीं करते तो संसार को पाप मुक्त कर सकना टेढ़ी खीर है, क्योंकि हर आदमी के पास पाप छुपाने के लिए एक मजबूत घड़ा है जो तभी फूटता है जब भर जाए। अतः इन स्थितियों में हमें केवल उन बड़े – बड़े पापियों की ही जानकारी हो पाती है जिनके घड़े फूट जाते हैं। मझौले, छोटे अथवा चतुर पापी जीवन भर पाप करने के बाद भी शान से अपने पाप, अपने साबूत घड़े में छुपाए दुनिया से विदा हो जाते हैं।
मैं व्यक्तिगत तौर पर भी भगवान से और उनके प्राइवेट सेक्रेटरी श्री चित्रगुप्त से जिनके खानदान का मैं स्वयं हूं यह निवेदन करता हूं कि अब वे आदमी को बिना घड़े के भेजने की व्यवस्था करें।
© श्री प्रतुल श्रीवास्तव
संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






