श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “धर्म संकट…“।)
अभी अभी # ९९१ ⇒ आलेख – धर्म संकट
श्री प्रदीप शर्मा
धर्म संकट का धर्म से कोई संबंध नहीं! एक अधर्मी भी धर्म संकट में पड़ सकता है। हम लोगों का रोज धर्म संकट से वास्ता पड़ता है। बाहर पिक्चर का प्रोग्राम बनाया और कोई अतिथि आ धमके। आदर सत्कार के बाद किसी बीमार को देखने जाने का बहाना ऐसे मौकों पर आम होता है। सबसे बड़ा धर्मसंकट वैसे भी अतिथि तुम कब जाओगे, का ही होता है।
धर्म संकट की काट युक्ति होती है! सुग्रीव-बाली संग्राम में बाली का वध मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम युक्ति से ही करते हैं। एक सी शक्ल वाले दो भाइयों में से बाली को पहचानना इतना आसान नहीं था। बाली को सामने से नहीं मारा जा सकता था, क्योंकि उसके प्रतिद्वंद्वी का आधा बल उसे मिल जाता था। अतः एक भाई को पुष्पहार धारण करा दिया जाता है और बाली वध सम्पन्न हो जाता है। अधर्मी को छल से मारने में कैसा धर्म-संकट।।
मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ, को आप कंफ्यूज़न कहेंगे, या धर्म संकट! अच्छे और बुरे में से एक को चुनना कोई धर्म संकट नहीं। वहाँ तो बुद्धि और विवेक काम आ जाते हैं। लेकिन जब दोनों बुरों में से किसी एक को चुनना हो तो, सलाह दी जाती है, कम बुरे को चुनो। बस वहीं धर्म संकट आ खड़ा होता है। कम बुरे को भी क्यों चुनो।
लीलाधारी योगेश्वर श्रीकृष्ण के पास महाभारत युद्ध के समय कोई धर्म संकट नहीं था, वे चाहते तो स्पष्ट रूप से धर्मराज युधिष्ठिर का साथ दे सकते थे और कौरवों का विरोध कर सकते थे। लेकिन उन्होंने दुर्बुद्धि दुर्योधन के सामने एक प्रस्ताव रखा। या तो मुझे ले लो, अथवा मेरी अक्षौहिणी सेना! बस, यहीं विवेक मात खा जाता है! विनाश काले विपरीत बुद्धि। मूर्खों के सामने कोई धर्म संकट नहीं होता। और दुर्योधन ने कृष्ण की चतुरंगिनी सेना माँग ली। अर्जुन चतुर था, उसे बिना मांगे न केवल कृष्ण जैसे सारथि मिल गए, पूरे विश्व को इस बहाने गीता का ज्ञान भी उपलब्ध हो गया।।
हमारे लिए मतदान कब धर्म-संकट सिद्ध हुआ! मतदान प्रतिशत बढ़ता जा रहा है, लोग शिक्षित, समझदार होते जा रहे हैं। घंटों कतार में खड़े रहकर आत्म-विश्वास से अपने मताधिकार का उपयोग करना ही स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है।
सोशल मीडिया पर जितनी भी उँगली उठाई जा रही है, मतदान के बाद दिखाई गई स्याही वाली उँगली सभी धारणाओं को ध्वस्त करती नज़र आ रही है कि मतदाता के मन में अपने उम्मीदवार को चुनने में कोई संशय है। कोई धर्म संकट नहीं। कोई देवासुर-संग्राम नहीं। महाभारत तो बिल्कुल नहीं! लोकतंत्र पूरी तरह सुरक्षित है।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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