श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सब्र का बांध…“।)
अभी अभी # १०४५ ⇒ आलेख – सब्र का बांध
श्री प्रदीप शर्मा
जब सब्र का बांध टूटता है तो आंखों से आंसुओं की झड़ी लग जाती है। नैना सावन भादो हो जाते हैं, बिन बादल बरसात हो जाती है।
सभी जानते हैं, बांध नदियों पर बनाया जाता है। भाखड़ा नांगल, टिहरी, चंबल, गांधी सागर और सरदार सरोवर, सब बांध ही तो हैं। नदियों के पानी को रोककर बिजली बनाई जाती है। एक समय में पूरे मध्यप्रदेश को चंबल से बिजली मिलती थी और राजस्थान को पानी। बाद में नर्मदा के सरदार सरोवर से मध्यप्रदेश तो पानी पानी हो गया और बिजली गुजरात चली गई। साथ ही गंगा जमुनी संस्कृति की जगह नर्मदा – साबरमती संस्कृति ने जन्म ले लिया और पूरे गुजरात में नर्मदा के पानी से नहरों का जाल बिछ गया। यही अंतर है कल के नेहरू और आज की विकास की नहरों में।।
बांध की एक सीमा होती है। जब बरसात और पहाड़ों का पानी नदियों में सैलाब बन फूट पड़ता है तो बांध के गेट खोलने पड़ते हैं। खतरों के निशान पर नजर रखनी पड़ती है। थोड़ी भी लापरवाही हुई और चारों ओर जल प्रलय। बारिश में जब यशवंत सागर के सभी साइफन खुल जाते हैं, तो नजारा देखते ही बनता है।
बस कुछ ऐसी ही स्थिति होती है, सब्र के बांध की ! कभी गुस्सा फूट पड़ता है तो कभी दुख का पहाड़। गुस्सा तो खैर तबाही ही मचाता है, इसलिए गुस्से को तो कंट्रोल ही करना चाहिए लेकिन अगर गम के आंसू हैं, तो उन्हें रोको मत, बहने दो ;
या दिल की सुनो दुनिया वालों
या मुझको अभी चुप रहने दो।
मैं गम को खुशी कैसे कह दूं
जो कहते हैं, उनको कहने दो।।
ये आंसू मेरे दिल की ज़ुबान है ! अभी कल ही हमारे परिवार के बेहद करीबी, मित्र और शुभचिंतक का आकस्मिक स्वर्गवास हो गया। साठ साल का साथ, 60 घंटों में टूट गया। लॉक डाउन में जो जहां है, वहीं सब्र किए बैठा है। मर्द को तो दर्द नहीं होता। औरतों का दिल तो रोता है जी। मेरी दोनों बहनें जो आने से मजबूर थी, फोन पर ही फट पड़ी। आंखों से टप टप आंसू। अगर पास भी होती तो मैं क्या कर लेता। पहले हाथों को सनेटाइज करता, शायद फिर उसके आंसू पोंछता। शायद गले तो फिर भी नहीं लगा पाता। अच्छा हुआ, कोरोना ने दूरी बनाई रखी।।
मुझे याद नहीं, मैं कब फूट फूट कर रोया। महिलाओं में भगवान ने करुणा के साइफन लगा रखे हैं, उधर दुख का पहाड़ टूटा, इधर सब्र का बांध टूटा और आंसुओं के सैलाब में सब कुछ जलमग्न।
कितना कुछ बह जाता है इन आंसुओं के साथ। इन्हें बहने देना चाहिए, रोकना नहीं चाहिए। जब कभी सदमे से ये आंसू सूख जाते हैं, तो मानसिक आघात अधिक घातक हो जाता है। ऐसे में आंसू जबरदस्ती लाए जाते हैं। जो लिखा था, आंसुओं के संग बह गया। रोना ज़रूरी है।
ये कोरोना हमें किसी के आंसू नहीं पोंछने देगा। कैसी शवयात्रा और कैसी शोक बैठक ! बस किसी को रोने को मजबूर ना करें, और अगर खुद को मज़बूरी में रोना पड़े, तो दर्जन भर नैपकिन साथ रखें। अब कोई आपके आंसू भी नहीं पोंछ सकता। रोने से जी हल्का होता है। सब्र का बांध टूटने दें। मुझे अच्छी तरह से रोने दें। बहुत दिन हो गए आंसू बहाए।।
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





