श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी गद्य क्षणिका – “सुख सुविधा…“।)
अभी अभी # 726 ⇒ सुख सुविधा
श्री प्रदीप शर्मा
कहते हैं, सुख दुख तो दिन रात और धूप छांव की तरह है, कभी सुख है, कभी दुख है, अभी क्या था, अभी क्या है। लेकिन सुख बड़ा स्वार्थी होता है, उसे जहां भी सुविधा नजर आती है, वह दुख का साथ छोड़ देता है और दुख बेचारा दुविधा में पड़ जाता है।
इसी तरह धन कभी निर्धन के पास नहीं जाता, उसे भी किसी दौलतमंद की तलाश होती है। धन दौलत और सुख सुविधा का एक अलग ही संसार होता है।
आप कह सकते हैं इनकी आपस में सांठगांठ होती है, nexus होता है।
क्या सुख, सुविधा का मोहताज है, क्या जहां सुविधा नहीं है, वहां सुख नहीं है। ऐसा नहीं है। सुख बड़ा खुदगर्ज और अवसरवादी है। क्या जब आज जैसी आधुनिक सुविधाएं नहीं थी, इंसान सुखी नहीं था। क्या बिजली का आविष्कार होने से पहले गर्मी लगने पर, हाथ से पंखा झलते हुए उसे सुख का अहसास नहीं होता था। एक हाथ जब दुखने लग जाता था, तो वह दूसरे हाथ से पंखा झलने लग जाता था। यहां देखिए सुख दुख दोनों साथ साथ चल रहे हैं। एक हाथ भी दुख रहा है, पंखा भी चल रहा है और सुख भी मिल रहा है।।
तब कहां इतनी सुख सुविधाएं थीं, कहां घर घर नल, ट्यूबवेल और डीजल के पंप सेट थे। लोग कुएं पर जाते थे, रस्सी बाल्टी से पानी निकालते थे, और स्नान करते थे। तब क्या उन्हें नहाने में सुख नहीं मिलता था। मेहनत और पसीना बहाने के बाद का सुख, कालांतर में आधुनिक सुविधा और धन दौलत ने हमसे छीन लिया।
इतनी सुख सुविधाओं और धन दौलत के बाद भी सुख में वह स्वाद क्यों नहीं जो असुविधा में रहते हुए, चूल्हे की रोटी और सिल बट्टे पर हाथ से पिसी चटनी में आता था। आज सुख सुविधा की यह स्थिति है कि रात में अचानक बत्ती गुल हो जाने से हम परेशान हो जाते हैं, पावर और नेट अगर एक साथ चला जाए तो सुखी दुखी हो जाते हैं।।
क्या सुख सुविधा और धन दौलत हमें चैन की नींद, सुख शांति और कड़ाके की भूख दे पाया है। अगर इसका उत्तर हां है तो हम जैसा सुखी कोई नहीं। और अगर इसका उत्तर ना है, तो हम जैसा दुखी, निर्धन और कंगाल कोई दूसरा नहीं। कोरोना काल में भी हमारे पास वह सब कुछ था, जो आज है, लेकिन केवल ईश्वर का साथ और इंसानियत ही हमारे काम आई। हमारे बीच कई अपने सगे, करीबी, दोस्त और रिश्तेदार ऐसे थे, जो सबका साथ छोड़ गए। नियति इतनी क्रूर भी हो सकती है, हमने पहली बार महसूस किया।
यह इंसान का स्वभाव है।
उसे सुख का पलना चाहिए, दुख की बैसाखी नहीं। पर क्या करें, हम छुट्टी के दिन चैन से परिवार के बीच बैठे हैं, अचानक फोन पर कोई बुरी खबर आ जाती है। सभी विचलित और दुखी हो जाते हैं। सुख सुविधा, धन दौलत अपनी जगह है। आप भले ही तत्काल प्लेन के टिकट बुक करा लें, कोई भी भौतिक सुख सुविधा आपका दुख कम नहीं कर सकती। यही हमारी नियति है। यही संसार है।।
सुख सुविधा और धन दौलत से ऊपर भी एक संसार संवेदना का है। किसी के सुख दुख में शामिल होना, सबके कल्याण की भावना रखना। हम ईश्वर से अपने लिए, अपने परिवार और परिजनों के लिए क्या नहीं मांगते। कहां कहां मन्नत नहीं मांगते। लेकिन क्या हमारा ध्यान कभी उधर भी जाता है, जो उपेक्षित हैं, असहाय हैं।
सुख सुविधा ही जीवन में सब कुछ नहीं होती। सब कुछ कहां शब्दों में बयां हो पाता है ;
अंधेरे में जो बैठे हैं
नजर उन पर भी कुछ डालो
अरे ओ रोशनी वालों।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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