श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फेंकने और झेलने की कला।)

?अभी अभी # 730 ⇒ आलेख – फेंकने और झेलने की कला ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

 ©CATCH & THROW©

हम छोटे थे तब से ही कैचम कैच की प्रैक्टिस किया करते थे। दो व्यक्ति और एक वस्तु, जो जरूरी नहीं कि गेंद ही हो। फिर चाहे वह बिस्तर का तकिया ही क्यों न हो। फेंकना और झेलना !

शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा होगा जिसने जीवन में कोई वस्तु फेंकी ना हो, अथवा झेली ना हो। यह एक ऐसी सहज क्रिया है, जिस पर उतनी ही सहज प्रतिक्रिया भी होती है। श्रीमान जी जल्दी में गाड़ी की चाबी भूल गए और पचास सीडियां नीचे उतर गए। अब वे वहीं से श्रीमती जी को आवाज लगाते है, जरा गाड़ी की चाबी फेंक देना, ऊपर ही रह गई है।

कौन सा भाला फेंकना है, श्रीमती जी साधकर ऊपर से चाबी फेंकती है और श्रीमान जी झट से उसे झेल लेते हैं। बहुत वर्षों से बहुत कुछ झेल रहे हैं।

क्रिकेट हो, सामाजिक जीवन हो, अथवा राजनीति फेंकना और झेलना कहां नहीं चलता। अगर कोई झेलने वाला ना हो और कोई फेंकता ही रहे, तो लोग उसे पागल कहते हैं।

हमने गुस्से में लोगों को बहुत कुछ फेंकते देखा है।।

अंग्रेजी में एक कहावत है, two is a company, three is a crowd! लेकिन क्रिकेट और राजनीति में ऐसा नहीं है। क्रिकेट के मैदान में सिर्फ गेंद ही फेंकी जाती है और झेली जाती है। एक गेंदबाज होता है जो लगातार गेंद फेंकता ही रहता है और एक बेचारा विकेट कीपर होता है, जिसे हर गेंद झेलनी पड़ती है। गेंदबाज और विकेट कीपर के बीच एक बल्लेबाज भी होता है जो बल्ले से धुलाई तो गेंद की करता है, लेकिन वह कहलाती गेंदबाज की धुलाई ही है। अगर गेंदबाज की फेंकी गई गेंद बल्लेबाज और विकेट कीपर दोनों से छूटकर बाउंड्री पार कर जाती है तो बल्लेबाज को चार रन एक्स्ट्रा बाय के मिल जाते हैं। चेतन शर्मा की फेंकी आखरी गेंद पर अगर कोई मियां दाद छक्का जड़ दे, तो जो क्रिकेट नहीं समझता, वह भी अपना सर पकड़ ले। आज अगर ऐसा होता तो हम मियां दाद की कॉलर पकड़ लेते।

झेलने में हमारे धोनी जी का जवाब नहीं। एक विकेट कीपर को केवल गेंद झेलनी ही नहीं पड़ती, हाथों हाथ फुर्ती से गेंदबाज को स्टंप भी करना पड़ता है। गेंदबाज की भी एक लक्ष्मण रेखा है, जिसे क्रीज़ (कमीज़ की नहीं) कहते हैं, खेलते वक्त थोड़ी भी रेखा पार की, और धोनी ने अपना कमाल बताया।।

जो तेज फेंकते हैं उन्हें तेज गेंदबाज कहते हैं, और जो घुमावदार गेंदबाजी करते हैं उन्हें स्पिन गेंदबाज कहते हैं। मुरली की गुगली में बल्लेबाज किस गली में धरा जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। अजीब खेल है क्रिकेट ! मैदान में चारों तरफ क्षेत्ररक्षक खड़े हुए हैं, जिनका काम रन को रोकना ही नहीं, गेंद को वापस फेंकना भी है। बल्लेबाज के शॉट को झेलकर उसे पेवेलियन भी पहुंचाना है।

राजनीति भी एक खेल ही तो है। झूठे सच्चे वादे, आश्वासन, और नेताओं की बड़ी बड़ी बातें, जनता को झेलनी ही पड़ती है। जिस भाषण पर राशन नहीं, उसे तो झेलना ही है। एक फेंकनेवाला गेंदबाज और १४० करोड़ झेलने वाले क्षेत्ररक्षक और फिर भी गेंद सीमा रेखा के पार।।

एक इंसान जीवन में क्या क्या नहीं झेलता। बचपन में घर में बड़े बूढ़े और स्कूल में मास्टर जी की रोज रोज की डांट ! कब तक झेले बेचारा। कभी गुस्से में बस्ता फेंकता है तो कभी जूते। बड़ा होकर भी उसे बहुत कुछ झेलना है।

गृहस्थी का बोझ, महंगाई की मार। उस बेचारे के पास फेंकने के लिए कुछ नहीं। उसे तो बस झेलते ही जाना है।

पहले घरों में रोशनदान होते थे, जिससे घर में रोशनी और हवा की आवाजाही बनी रहती थी, तथा कमरों में घुटन नहीं रहती थी। आजकल हवा फेंकने का काम पंखे, कूलर और ए.सी. करते हैं। रसोईघर और प्रसाधन कक्ष में प्रदूषित हवा बाहर फेंकने के लिए एग्जास्ट फैन लगाए जाते हैं।।

इंसान भी कब तक सब कुछ झेलता ही रहे। उसे अंदर का तनाव और कुंठा बाहर फेंकना ही चाहिए।

हमारी घर की महिलाएं भी क्या क्या नहीं झेलती। इसका विरेचन आवश्यक हो जाता है। हमारी आधी बीमारियों की जड़ सीमा से अधिक सहन करना और चुप रहना है। हमें क्यों तनाव और नेता क्यों मस्त। बस यही कारण, कोई फेंक रहा है, और कोई झेल रहा है। कहीं कोई आपके साथ खेल तो नहीं रहा है ?

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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