श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पैदा होने का सुख।)

?अभी अभी # 740 ⇒ आलेख – पैदा होने का सुख ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पैदा होने वाले से, पैदा करने वाला बड़ा होता है। पैदा होना, जीव की नियति है, इसमें सुख और दुःख का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। पैदा होना, किसी का जन्मसिद्ध अधिकार भी नहीं। जो हो गया, सो हो गया। जो नहीं हुआ, सो नहीं हुआ। कहीं सिंगल चाइल्ड, तो कहीं वर्ल्ड इलेवन।

वैसे यह शीर्षक बड़ा भ्रामक है। असली समस्या पैदा होने में नहीं, पैदा करने में है। सृजन सुख जिसे हम मातृत्व सुख भी कह सकते हैं, इसमें पैदा होने वाला तो एक तरह से अकर्ता ही हुआ। सुख दुःख और प्रारब्ध की गठरी अपने सर पर लिए उसे तो बस, इस संसार में प्रवेश करना है। वह एक तरफ पड़ा रोता रहेगा, लोग उसके जन्म की खुशियां मनाते रहेंगे।।

सृजन, सृष्टि का विधान है, नियम है, चक्र है, नियति है। आज अगर हम पैदा नहीं होते, तो कहां होते, जैसे बेतुके और बेबुनियाद प्रश्नों का कोई जवाब नहीं होता। जो हो गया, सो हो गया, जो नहीं हुआ, सो नहीं हुआ। कहीं कोई निःसंतान है तो कहीं संतानों की कतार खड़ी है। इसमें होने वाले का कोई दोष नहीं, जिसके कोई संतान नहीं, उसके लिए भी कोई सहानुभूति नहीं, जिसने पैदा किया, उस पर जरूर आज नहीं तो कल गाज गिरने वाली है, क्योंकि आदमी पर जनसंख्या भारी है।

जो अच्छे संपन्न घरानों में पैदा हुए, चंदन के पालने में झूले, वे अपने आपको सुखी और भाग्यशाली मान सकते हैं, लेकिन रोहिंग्या शरणार्थी, जो न घर का है, न घाट का, कहीं घुसपैठिया है, तो कहीं आतंकवादी, उसके पैदा होने अथवा जिंदा रहने का क्या औचित्य ?

कंट्रोल, कंट्रोल, पेस्ट कंट्रोल !

मेरे घर में आजकल कॉकरोच और छिपकली का सामूहिक सत्संग चल रहा है। पूरा घर कीट पतंग प्रसूति गृह बना हुआ है। जनसंख्या अधिनियम के भरोसे मैं नहीं बैठ सकता। पेस्ट कंट्रोल मेरा अधिकार है। कीड़े मकोड़ों को जीने का अधिकार किसने दिया। अगर कण कण में भगवान है, तो इन्हें भगवान के पास पहुंचाने में ही समझदारी है।

करे कौन भरे कौन ! किसी लेखक की अच्छी रचना को नाम मिल जाता है, प्रसिद्धि मिल जाती है, लेखक और रचना अमर हो जाते हैं तो कुछ रचनाएं ऐसी भी होती हैं, जो पढ़ने के बाद संपादक द्वारा रद्दी की टोकरी में फेंक दी जाती है। उनकी भ्रूण हत्या हो जाती है, उन्हें इस संसार में आने ही नहीं दिया जाता। वे क्या जानें, किसी लेखक की रचना होने का सुख क्या होता है।।

जो पैदा हो गया, सो हो गया, जो रह गया सो रह गया ! किसी जैविक हथियार अथवा पेस्ट कंट्रोल से जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता। अभी तो हम अपने चुने हुए सांसद और विधायक को ही वापस नहीं बुला सकते, जिन्हें भगवान ने इस संसार में भेज दिया, उनका तो भगवान ही मालिक है लेकिन आइंदा अब पैदा होने का सुख इतना आसान भी नहीं होगा ! First come first serve! दो के बाद वैक्सीन ख़त्म।

कुछ कथित सेलिब्रिटीज लिव इन रिलेशन में रहकर दिखावे के लिए ही सही, अनाथ बच्चों को गोद ले रहे हैं। जो पैदा हो गए हैं, उन्हें बेहतर जिंदगी नसीब हो सके इसलिए जनसंख्या नियंत्रण का पालन करते हुए संपन्न लोग भी अगर कुछ have not बच्चों को पालने का संकल्प ले लें, तो शायद सरकार को कोई आपत्ति नहीं होगी। पैदा तो हो गए, पैदा होने का सुख भी अगर उन्हें नसीब हो, तो क्या बुरा है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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