श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एक अनार…“।)
अभी अभी # 742 ⇒ आलेख – एक अनार
श्री प्रदीप शर्मा
न जाने क्यों, जब भी एक अनार की बात आती है, सौ बीमार बीच में आ जाते हैं ! आज हम सिर्फ अनार की बात करेंगे, किसी बीमार की नहीं।
यह एक सर्वविदित तथ्य है कि एक बीज में पूरा वृक्ष समाया रहता है। जब तक बीज किसी स्थान पर सुरक्षित होता है, तब तक वह केवल एक बीज ही रहता है, लेकिन जैसे ही उसे भूमि में बो दिया जाता है, हवा पानी और प्रकाश की मदद से उसका स्फुरण हो जाता है, और कालांतर में शनैः शनैः वह एक वृक्ष अथवा पौधे में परिवर्तित हो जाता है। फलते-फूलते, पुष्प और फल से वह अलंकृत होता है। यह एक बीज की जन्म से विकास की यात्रा है।।
मेरे हाथ में एक अनार है ! मैं उसकी संरचना पर गौर कर रहा हूँ। एक टेस्ट क्रिकेट की लैदर बॉल की शक्ल अख्तयार किए, गोलाकार, स्वास्थ्यवर्धक अनार, जिसकी प्रशंसा में कसीदे कढ़े जाते हैं।
ऊपर केवल मज़बूत छिलका, जो एक किले की तरह अनार के दानों को सुरक्षा प्रदान करता है।
अनार ऐसा फल नहीं कि केले की तरह इधर छीला, और उधर उदरस्थ ! न ही आम की मानिंद रस-भरा, उँगलियों से नर्म किया और चूस लिया। प्रकृति और ईश्वर एक ही महा-शक्ति के दो नाम हैं। उसकी हर रचना पर उसका कॉपीराइट होता है। आप उसकी नकल तो कर सकते हैं, पर उस रचना में प्राण नहीं फूँक सकते। अनार का अपना एक नेटवर्क होता है। लाल-लाल मोतियों से अनार के दाने इस खूबसूरती से एक झीने सफेद आवरण में सजे हुए होते हैं, कि आँखें फटी की फटी रह जाती है। मधुमक्खी के छत्ते की तरह ऐसे एक नहीं कई आवरणों में उन्हें सजाया जाता है। मानो उन्हें सात तालों में सुरक्षित रखा गया हो।।
अनार केवल छिलके को नहीं कहा जाता। वह तो केवल उसका बाहरी सुरक्षा कवच है।
रस भरे दानों की तुलना आप नींबू से भी नहीं कर सकते। नींबू के बीजों को तो निचोड़ते वक्त निष्ठुरतापूर्वक फेंकना पड़ता है। लेकिन रसयुक्त अनार के दानों में मौजूद बीज भी बड़े लाभकारी होते हैं। उलटबासी देखिये !
वास्तव में लाल लाल रसभरे दाने ही अनार हैं, लेकिन उनके अंदर के बीज को अनार-दाना कहते हैं। जिन्हें अनार नहीं पसंद, वे भी अनार-दाने के चूर्ण से इंकार नहीं कर सकते। यह स्वादिष्ट और पाचक दोनों होता है।
एक जान के कई दुश्मन। इस अनार को तो डाल पर लगते देख ही आज़ाद पंछी और चंचल-चपल बंदर टूट पड़ते हैं। इनकी सुरक्षा के लिए इन्हें कपड़े तक में बाँधना पड़ता है। रसभोगी कीड़े तक अनार को नहीं छोड़ते।।
इतनी कष्ट और संघर्षपूर्ण यात्रा के बाद बागान से बाज़ार, और बाज़ार से हमारे हाथों में पहुँचने वाला ईश्वर का यह अनमोल उपहार मैं पहले उसको अर्पित कर, पश्चात, प्रसाद रूप में ग्रहण करता हूँ !!
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





