श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चतुर्थ श्रेणी …“।)
अभी अभी # 743 ⇒ आलेख – चतुर्थ श्रेणी
श्री प्रदीप शर्मा
एक बच्चों का प्यारा सा गाना है –
एक, दो, तीन, चार
भैया बनो होशियार
सबका है कहना
अनपढ़ न रहना
जाओ गुरुजी के पास।
न जाने क्यों गिनती चार के आगे बढ़ती ही नहीं ! दौड़ में तो एक, दो, तीन से ही काम हो जाता है, लेकिन ज़िन्दगी में सब वन टू का फोर करने में लगे रहते हैं।
इंसान कितना भी पढ़ा-लिखा हो, उसे चतुर्थ श्रेणी से गुजरना ही पड़ता है। कॉपी किताब के कवर पर जहाँ चौथी कक्षा अथवा 4th क्लास लिखना होता था, वहाँ रोमन में IV तह क्लास लिखने का एक अलग ही मज़ा था। अगर गलती से डंडा आगे लग गया तो VI th क्लास हो जाता था। पुराने ज़माने की दीवार घड़ी में भी सभी अंक रोमन में ही लिखे रहते थे। आखरी अंक XII बारह का होता था।
परीक्षा में अंक कितने भी लाओ, उत्तीर्ण होने की तीन ही श्रेणियां होती थीं। प्रथम, द्वितीय और तृतीय। एक मेरा मित्र हमेशा गर्व से कहता था :
I never stood second!
क्योंकि वह हमेशा थर्ड डिवीज़न में ही पास होता था।।
अंग्रेजों के ज़माने में रेल में तीन श्रेणियां हुआ करती थी। फर्स्ट, सेकंड और थर्ड ! अंतराल में थर्ड क्लास हटा दी गई और थर्ड क्लास की सुविधाएँ सेकंड क्लास वालों को उपलब्ध करा दी गई। आज आप सेकंड क्लास से कम दर्जे में सफर नहीं कर सकते।
जो लोग ज़्यादा पढ़ाई नहीं कर पाते थे, वे या तो खेती बाड़ी या कोई काम धंधा संभाल लेते थे, या फिर शासकीय नौकरी से संतुष्ट हो जाते थे। शासकीय नौकरी एक समय बड़ी आसानी से मिल जाया करती थी, और मुश्किल से छूटती थी। आजकल मुश्किल से मिलती है और उसे बड़ी मुश्किल से पकड़े रखना पड़ता है।।
एक समय था जब चौथी पास व्यक्ति को एक चतुर्थ श्रेणी की शासकीय नौकरी आसानी से मिल जाती थी। आजकल स्नातकोत्तर को भी नहीं में उत्तर मिलने लगा है।
शासकीय कर्मचारियों की भी चार श्रेणियां होती हैं। प्रथम श्रेणी अधिकारी, द्वितीय श्रेणी अधिकारी, तृतीय श्रेणी कर्मचारी और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी। शासकीय गज़ट में केवल दो ही श्रेणियां हैं, प्रथम और द्वितीय, जिसे हम नौकरशाह अथवा ब्यूरोक्रेट भी कहते हैं और जिनके भरोसे हमारा देश चल रहा है।।
कहीं श्रेणी है, तो कहीं डिग्री !
चतुर्थ के ऊपर तृतीय है। तृतीय श्रेणी को थर्ड डिग्री भी कहते हैं। जो पुलिस के लिए थर्ड डिग्री है, वह रेकी चिकित्सा पद्धति में प्रथम और द्वितीय से भी ऊँची थर्ड डिग्री है। भारतीय त्योहारों और तिथियों में चतुर्थी अथवा चौथ का बड़ा महत्व है।
हमारी वर्ण व्यवस्था में भी चार श्रेणियां हैं। वहाँ भी पहली दो श्रेणी राजपत्रित है। आप उन्हें सुविधानुसार ब्राह्मण और क्षत्रीय कह सकते हैं। बड़े बाबू वणिक हैं। चतुर्थ श्रेणी भृत्य अथवा चपरासी के लिए सुरक्षित है।
समय बदल रहा है ! शिक्षा का स्तर सुधर रहा है। कोई बच्चा अनुत्तीर्ण ही नहीं होता ! फर्स्ट, सेकंड, थर्ड की जगह ग्रेड सिस्टम लागू हो गया है। 99/100 मार्क्स लाने पर प्रश्न किया जाता है, कि परीक्षक ने एक नंबर क्यूँ काटा।।
देश में समाजवाद तो संभव नहीं ! जब वर्ण व्यवस्था की ही कमर टूट गई है, तब अब इस चतुर्थ श्रेणी का औचित्य ही क्या है। जब स्वच्छ भारत अभियान में सभी अपना योगदान दे सकते हैं, तो अपना काम खुद क्यूँ नहीं कर सकते। क्यों साहब से मिलने से पहले चपरासी से मिला जाए। दिन भर कुर्सी तोड़ने और बार बार एक ग्लास पानी मँगवाने के दिन अब लद गए। सभी प्राइवेट ऑफिस में आदमी और मशीन काम करती है, कोई चपरासी नहीं।
पिछले चुनाव में देश में सभी चौकीदार हो गए थे। चुनाव में ही क्यों, और चौकीदार ही क्यों ? अगर हर इंसान अपना काम खुद करने लगे तो चतुर्थ श्रेणी की आवश्यकता ही नहीं पड़े। क्या पता, कल का चौकीदार, इस बार चपरासी बन अच्छे-अच्छोंको पानी पिला दे।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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