श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हास्य चिकित्सा…“।)
अभी अभी # ७५१ ⇒ आलेख – हास्य चिकित्सा
श्री प्रदीप शर्मा
laughter therapy
जो हंसना नहीं जानता, वो बीमार है। जिस तरह कली का खिलना, फूल का खिलना और बच्चे का खिलखिलाना प्रकृति की देन है, उसी तरह जिन होठों पर मुस्कुराहट नहीं, वे होंठ उदास हैं, अतृप्त हैं। मुस्कान जिसे हम स्माइल भी कहते हैं, वह मीलों दूर तक अपना प्रभाव छोड़ती है। मुस्कुरा लाड़ले मुस्कुरा।।
हास्य चिकित्सा एक प्रकार की चिकित्सा है जिसमें हँसी और हास्य का उपयोग स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए किया जाता है। यह दर्द, तनाव, और चिंता को कम करने में मदद कर सकती है, साथ ही मनोदशा और आत्मसम्मान में सुधार कर सकती है.
हास्य चिकित्सा के कई फायदे हैं, जिनमें शामिल हैं –
- हँसी से शरीर में एंडोर्फिन नामक रसायन का उत्पादन, जो दर्द को कम करने में मदद करता है.
- हँसी से तनाव हार्मोन का स्तर कम होता है।
- हँसी से शरीर में डोपामाइन नामक रसायन का उत्पादन होता है, जो खुशी के साथ साथ, मनोदशा में भी सुधार करने में मदद करता है. हँसी से शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ सकती है।।
- हँसी से सामाजिक संपर्क में वृद्धि हो सकती है, जो अकेलेपन को कम करने में मदद करता है.
- हास्य चिकित्सा से जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है।
हँसी आती है सुनकर कि –
आजकल आदमी हंसना भी भूल गया है। वह हंसता जरूर है, लेकिन अक्सर उसकी हंसी या तो खोखली होती है, या फिर वह अपनी खुद की दुर्दशा पर ही हंसता नजर आता है।।
हंसता और हंसाता तो एक जोकर भी है, लेकिन हंसना, हंसाना उसका स्वभाव नहीं, मजबूरी है।
हास्य को भी हमने संयम और मर्यादा में बांध दिया है। खी खी और हा हा करना भी कोई हास्य है। हंसने की भी तमीज होती है, जिस तरह छींकने और खांसने की होती है। अगर किसी कारण सबके सामने आपकी हंसी रुक नहीं रही है, तो पहले एक्स्यूज़ मी कहिए और मुंह पर रूमाल रखकर हंस लीजिए और फिर भी अगर हंसी नहीं रुक रही हो, तो किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाइए। यहां वहां, बिना वजह हंसना विक्षिप्तता की निशानी है।
हंसने की भी कुछ शर्तें होती हैं, कुछ सामाजिक मर्यादा होती है। फूहड़ हास्य संगीत और कपिल का लाफ्टर शो कथित हास्य की श्रेणी में नहीं आता . यहाँ तक कि अब तो व्यंग्य ने भी हास्य से पलड़ा झाड़ लिया है। व्यंग्य की तुलना में हास्य को कम ही आंका जाता है। व्यंग्य को साहित्य और हास्य को लुगदी साहित्य समझा जाने लगा है। क्या कभी सुरेन्द्र मोहन पाठक अथवा ओमप्रकाश शर्मा को साहित्य के ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा जा सकता है। ऐसी बातें अक्सर हंसी में उड़ा दी जाती हैं।।
लेकिन हम जीवन में हास्य के महत्व को समझते हैं और रोज सुबह एक लाफ्टर थेरेपिस्ट हमें लाफ्टर की ट्रेनिंग देते हैं।
दोपहर हमारा फिजियोथैरेपिस्ट के लिए नियत रहता है और शाम को हम म्यूजिक थेरेपी के लेसंस लेते हैं। अगर कुछ समय और निकाल पाए तो जिम जाने का भी इरादा है।
बस इतना सब कुछ करने के बाद हमारे जीवन में करने को और क्या रह जाता है। बड़ा टाइट शेड्यूल है जी। फिर भी अगर और कोई सकारात्मक सुझाव आप दे सकें तो आपका स्वागत है।।
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






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