श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मिच्छामि दुक्कड़म।)

?अभी अभी # ७७४ ⇒ आलेख – मिच्छामि दुक्कड़म ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

तपस्या और आत्मशुद्धि का पर्व पर्युषण पर्व कहलाता है। आप चाहें तो इसे संतों का चातुर्मास भी कह सकते हैं। मन, वचन और कर्म की शुद्धि के बिना आत्म शुद्धि संभव नहीं। संस्कारों की ही शुद्धि को आत्म शुद्धि से जोड़ा गया है।

मनुष्य गलतियों का पुतला है। Man is a bundle of mistakes. गलती करना मनुष्य का काम, क्षमा करे सो भगवान ! To err is human. हम सुबह अपना मुंह तो आईने में देख लेते हैं, लेकिन हमारा आचरण हम किस आईने में देखें।

जब भी हम ज्ञान बांटने की कोशिश करते हैं, कबीर साहब जरूर बीच में आ टपकते हैं ;

बुरा जो देखन मैं चला,

बुरा ना मिलिया कोय।

जो दिल खोजा आपना

मुझसे बुरा ना कोय।।

आज का मनोविज्ञान तो कुछ और ही कहता है।

व्यक्तित्व निर्माण और मोटिवेशनल स्पीच में तो आपको अपनी खूबियों का ही प्रदर्शन करना है, अपनी कमजोरियां अगर किसी को जाहिर हो गई तो समझो हो गया इंटरव्यू !

आदमी गलतियों से महान बनता है, लेकिन एक बार महान बन जाने के बाद उसकी गलतियों का भी महिमा मंडन होने लगता है।

जो कार्य हमें अकेले में करने में संकोच होता हो, अगर वह सामूहिक रूप से किया जाए तो हमारा उत्साह तो बढ़ता ही है, हमारा संकोच भी टूट जाता है। अकेले सड़क पर झंडा लेकर कौन नारा लगाता है। जिंदाबाद मुर्दाबाद भी अकेले में नहीं होता। समूह में जान है वर्ना इंसान बेजान है।।

अक्सर हम वही करते हैं, जो हमसे बड़े करते हैं, क्योंकि हम सीखते तो उनसे ही हैं। कुछ पर्व और उत्सव मिलने जुलने के होते हैं तो कुछ गिले शिकवे दूर करने के। बुरा न मानो होली है। आओ साल भर के करे कराए पर पानी फेरें। भैया, होली पर तो गले मिल लो। एक प्यार का रंग सभी रंगों पर भारी होता है।

बचपन में हमें बात बात पर डांट पड़ती थी। स्कूल में किसी ने मास्टर जी से चुगली कर दी तो मार भी खाओ और माफी भी मांगो। बड़े छोटे में घर में झगड़ा हुआ, तो गलती छोटे की ही मानी जाती थी। मांगो माफी। दफ्तर में थोड़ी अनियमितता हुई अथवा देर से पहुंचे तो say sorry !

वैसे आजकल बोलचाल की भाषा में सॉरी इतना आम हो गया है कि लोग छींकने, डकारने और खांसने पर भी सॉरी बोलने लग गए हैं। लेकिन हमारे अहं पर चोट तब पहुंचती है जब हमें बिना कारण कभी कभी माफी मांगने पर बाध्य होना पड़ता है।

कभी अपने किये पर, तो कभी अपने कहे पर। अगर हमें अपनी गलती का अहसास हुआ तो शायद हम माफी मांग भी लें, वर्ना अपमान का घूंट पीना कौन पसंद करता है।

राजनीति में मानहानि और माफीनामे बहुत चलते हैं।

आम आदमी का अहं ऐसे भी इतना बड़ा नहीं होता। उसकी तो पूरी जिंदगी ही माफी मांगने और माफ करने में गुजर जाती है।।

जिंदगी के लेखा जोखा की हम बात नहीं करते, लेकिन साल भर का लेखा जोखा तो एक व्यापारी भी रखता है। साल में एक बार लोग इनकम टैक्स का रिटर्न भी फाइल करते हैं। आय व्यय और लाभ हानि जीवन के हर क्षेत्र में होती है। साल भर में कम से कम एक बार घर की सफाई, दिवाली के बहाने ही, हो ही जाती है। हमारी उपलब्धियों का भी लेखा जोखा हमारे पास होता है, लेकिन क्या गलतियों का भी कुछ हिसाब किताब रखा जाता है अथवा सब गंगा जी में बहा दिया जाता है।

देखिए साहब हम धार्मिक भी हैं और समय के हिसाब से ईमानदार भी। दान पुण्य भी हैसियत के हिसाब से कर ही लेते हैं।

बाकी भूल चूक लेनी देनी तो चलती ही रहती है जीवन में। बस यही समझकर अगर इस पर्युषण पर्व पर सबसे माफी मांग ली जाए तो क्या बुरा है।।

माफी मांगना भी गंगा नहाने जैसा ही है। अगर चित्त ही मलिन हो तो कैसा गंगा स्नान ! जिस गलती को ईसाई चर्च में कन्फेशन बॉक्स में जाकर कुबूल करते हैं, हम उसे खुले आम स्वीकार कर, उसके लिए माफी मांगते हैं। जाने अनजाने में हमसे कई गलतियां होती हैं, सबका सामूहिक माफीनामा है मिच्छामि दुक्कड़म।

आत्म शुद्धि से बड़ा कोई पर्व नहीं। हमारे सभी समुदायों के पर्व यही संदेश देते हैं। रिद्धि सिद्धि के प्रदाता गजानन श्रीगणेश की दस दिन तक समारोह पूर्वक पूजा अर्चना, पूर्वजों को समर्पित श्राद्ध कर्म, और नवरात्रि में माता की आराधना भी हमारी आत्म शुद्धि का प्रयास ही है। आइए, माफ करें, और माफी मांगें। मिच्छामि दुक्कड़म।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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