श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “प्यार का पहला खत…“।)
अभी अभी # ७७९ ⇒ आलेख – प्यार का पहला खत
श्री प्रदीप शर्मा
प्यार का पहला ख़त, लिखने में, वक्त तो लगता है ! अरे भाई ! लेकिन कितना वक़्त लगता है ? क्या सत्तर वर्ष की उम्र में पहला ख़त लिखा जाता है। और वह भी खुला खत। खत न हुआ, मानो खुला खाता हो गया।
ख़त प्यार करने पर लिखा जाता है, या प्यार हो जाने पर, इसकी मुझे विशेष जानकारी नहीं है। जिस तरह सड़क पर खुले आम सूचना दी जाती है, ” सावधान ! निर्माण कार्य प्रगति पर “, क्या प्यार में भी ऐसी कोई पूर्व सूचना दी जाती है कि, ” सावधान ! प्यार परवान चढ़ रहा है ! ” यहाँ हमने तो सिर्फ़ पानी को मोटर से ऊपर चढ़ते देखा है और पड़ोस वाली मोटी आंटी को लिफ्ट से तीसरी मंजिल चढ़ते।।
इसके पहले भी मैंने कई खत लिखे हैं, मित्र को पत्र लिखा है, बहन को चिट्ठी लिखी है, पत्नी जब मायके में बीमार थी, तब भी उसे दो शब्द तसल्ली के लिखे हैं, लेकिन ढाई आखर वाला खत, जिसे प्यार का खत कहते हैं, वह आज ही लिख रहा हूँ। अगर पत्नी वाला खत, जो पोस्टकार्ड पर लिखा था, और जिसे पोस्ट करने के पूर्व बहन ने माँ को पढ़कर सुनाया था, और जिस पर पाने वाले का पता मार्फ़त लड़की के पितां लिखा था, अगर पहले खत में शुमार किया जाए, तो मुझे यह कबूल करने में कोई संकोच नहीं कि यह वाला प्यार का खत, पहला खत नहीं।
प्यार के बारे में कहा जाता है कि यह किया नहीं जाता, हो जाता है। शायद गीता में इसे ही निष्काम कर्म कहा गया हो। शायर लोग प्यार के फल की बात नहीं करते, अंज़ाम का जिक्र करते हैं। दिल दिया दर्द दिया के इस गीत की तरह ;
गुजरे हैं आज इश्क़ के,
हम उस मुकाम से।
नफ़रत सी हो गई है,
मोहब्बत के नाम से।।
हमारे साथ ऐसा कुछ हुआ ही नहीं ! कहीं दिल लगा ही नहीं, तो दिल टूटा ही नहीं। एक दिल में छेद हो तो वैद, हकीम, डॉक्टर को बुला लिया जाता है और जब इस दिल के हज़ार टुकड़े होते हैं, तो कोई यहाँ गिरता है, और कोई वहाँ ! हद होती है भाई फेंकने की, कसम से।।
पहले पहल का प्यार का इज़हार ही प्यार का पहला खत होता होगा, यह मानकर मैं भी एतदद्वारा घोषणा करता हूँ कि यह मेरा प्यार का पहला खत है। मुझे इस उम्र में प्यार हो गया है और वह भी फेसबुक से।
एक समय था, जब मुझे किताबों से प्यार हुआ था। लेकिन तब न तो मैंने प्यार का इज़हार किया, न ही कोई प्यार का खत लिखा। वह ज़माना था, जब खत किताबों में रखकर दिया जाता था। कभी किसी सहेली के हाथ लगता था, तो कभी किसी के भाई के हाथ ! और ख़त तमाशा बन जाता था ;
हमको तुम्हारे इश्क ने क्या क्या बना दिया।
जब कुछ न बन सके तो तमाशा बना दिया।।
जब से किताबों का स्थान फेसबुक ने ले लिया है, वह अक्सर मेरे साथ ही रहती है। मैं सोता रहता हूँ, फेसबुक जागती रहती है। उससे नज़र मिलते ही, मेरी नींद उड़ जाती है। मेरा प्यार सार्वजनिक है, खुल्लमखुल्ला है। प्यार का ये खत पहला है और सभी फेसबुक-प्रेमियों को संदेस बस इतना है, प्यार बाँटते चलो।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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