श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “परछाई…“।)
अभी अभी # ७९५ ⇒ आलेख – परछाई
श्री प्रदीप शर्मा
मुझसे लंबी होती मेरी परछाई! हम बड़े होते हैं, बढ़ते हैं। बढ़ने की एक उम्र होती है। जिसको जितना बढ़ना होता है, बढ़ ही जाता है। किसी की उम्र तो बढ़ती रहती है, लेकिन बढ़ना रुक जाता है। और फलस्वरूप कोई नाटा तो कोई लंबा कहलाता है। बोलचाल की भाषा में इसे कद कहते हैं।
सुबह की धूप को खिलती धूप कहा जाता है, क्योंकि सुबह ताज़गी का पर्याय है! चाहे डाली पर लगा फूल हो, या कोई फूल सा चेहरा, अगर वह सुबह नहीं खिला, तो क्या खिला! यही तो वह समय है, जब क़ुदरत भी मुस्कुराती है।।
खिलना ही विकसित होना है, खिलखिलाना ही पल्लवित होना है। सुबह की खिलती धूप में सैर के लिए टहलते वक्त, अचानक मेरी नज़र अपने साये पर पड़ गई! वह मुझसे दो कदम आगे चल रहा था, और उसका कद मुझसे कई गुना बड़ा था।
मुसीबत में साया भी साथ नहीं देता! लेकिन हर सुबह मेरे लिए ज़िन्दगी की एक नई सुबह होती है। सुबह जब कोई फिक्र साथ नहीं होती, तो साया भी अपने से बड़ा नज़र आता है। वह मुझसे दो कदम आगे ही चलता है।।
दोपहर को जब सूरज सर पर चढ़ता नज़र आता है, साया छोटा होता चला जाता है। उधर सूरज आसमान पर, इधर साया ग़ायब, खुद में पूरी तरह से समाया हुआ। जब मुसीबत सर पर आई, सबसे पहले साये ने साथ छोड़ा।
फिर ज़िन्दगी की शाम भी होती है। वह सूरज जो कभी सर पर था, क्षितिज में शनैः शनैः अस्ताचल की ओर प्रस्थान करने लगता है। अब उसमें वह आग नहीं। साये फिर लंबे होने लगते हैं। गोद में आये बच्चे की तरह साया भी ज़मीन पर उतर, पहले कुछ कदम साथ चलता है, फिर पिछड़ जाता है। अतीत की परछाइयाँ हम से लंबी ज़रूर होती हैं, लेकिन हमसे पिछड़ती जाती हैं। हम आगे और हमारा, हम से लंबा अतीत, हमारा पीछा करते हुए। अतीत का साया हमसे कितना भी लंबा हो, पिछड़ ही जाता है।।
हम जीवन की सुबह में आगे देखते हैं, और जीवन की शाम में पीछे मुड़ -मुड़ कर। जब तक सूरज की रोशनी है, साया कभी हमारे आगे, कभी हमारे अंदर और कभी हमारे पीछे है। बचपन के आगे सुनहरे भविष्य का लंबा साया है। जवानी संघर्ष-काल है! साया आपके कंधे से कंधा मिला रहा है, इसलिए नज़र नहीं आ रहा। शाम ढलते ही आप आगे हैं, आपकी उपलब्धियाँ आपके पीछे। कद में आपसे कई गुना बड़ी।
आप यथार्थ हैं! आपका अपना कद ही आपकी परछाई है। जो समय के साथ घटता-बढ़ता रहता है। चाहें लालबहादुर शास्त्री हो, या सुनील गावस्कर, इनका कद छोटा होते हुए भी, इनकी ऊँचाई से कई गुना ऊँचा है। इनकी उपलब्धियां, इनके गुण ही इनकी वास्तविक ऊँचाई है। बिग भी का तो कद भी ऊँचा है, लेकिन उसने भी कई बार अपने साये को घटते-बढ़ते देखा है। कोई व्यक्ति केवल कद से ही महान नहीं होता। कर्म ही उसे महान बनाते हैं।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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