श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “भैंस के आगे बीन…“।)
अभी अभी # ७९८ ⇒ आलेख – भैंस के आगे बीन
श्री प्रदीप शर्मा
बीन एक वाद्य यंत्र है कि नहीं, मैं नहीं जानता, लेकिन इतना जरूर जानता हूं कि अगर दुधारू पशुओं को संगीत सुनाया जाए, तो वे अधिक दूध देते हैं। फिर भी विशेषज्ञ हमें भैंस के आगे बीन बजाने से रोकते हैं, कहते हैं, भैंस के आगे बीन बजाने से क्या फायदा। भैंस तो दूध देने से रही, कहीं बीन की धुन सुन कोई नागिन प्रकट ना हो जाए, क्योंकि कल्याणजी आनंद जी के बाद बीन पर केवल नागिन का ही तो कॉपीराइट हैं। वैसे भी मन डोले, मेरा तन डोले, पर भैंस का नागिन डांस, एक हास्यास्पद कल्पना ही हो सकती है, कोई रियलिटी शो नहीं।
भैंस के बारे में हमारे कई पूर्वाग्रह हैं। अगर कबीर ढाई आखर प्रेम का पढ़ने वाले को पंडित मानते हैं, तो हम निरक्षर के बारे में यह घोषणा कर देते हैं, कि उसके लिए तो काला अक्षर भैंस बराबर है। एक छोटा सा अक्षर जिसका कभी क्षरण नहीं होता, उसकी तुलना किसी विशालकाय भैंस से करना, क्या अक्षर का अपमान नहीं। बेचारी भैंस का क्या वह तो वैसे ही बदनाम है। उसके आगे आप चाहे बीन बजाओ अथवा राग भैरवी गाओ।।
मैंने केवल बचपन में मां का दूध पीया है, उसके बाद आज तारीख तक मेरा पालन पोषण भैंस के दूध पर ही हुआ है, फिर चाहे वह बंदी के दूधवाले का पानी मिला दूध हो अथवा अमूल और सांची का फैट युक्त गोल्डब्रांड भैंस का दूध। मुझे दूध पर भी भरोसा है, और अपनी अक्ल पर भी। लेकिन जब किसी को यह कहते सुनता हूं कि अक्ल बड़ी या भैंस, तो मुझे तो भैंस ही बड़ी लगती है, क्योंकि उसी के दूध से मुझमें बुद्धि और प्रज्ञा का विकास हुआ है। मैं अपना अपमान सह सकता हूं, लेकिन भैंस का नहीं।
आखिर भैंस के प्रति इतना दुराग्रह क्यों। द्वापर युग में गोवर्धन धारी भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया, गोकुल, नंदगांव और वृंदावन की कुंज गलियों में गोप गोपियों सहित रास रचाया, छोटी छोटी गैया और छोटे से गोपाल को कौन भूल सकता है। बालकृष्ण की बंसी की तान पर क्या गऊ और क्या ग्वाल, सब दौड़ पड़ते थे, लेकिन बस बेचारी भैंस का ही कहीं वर्णन देखने/सुनने में नहीं आया।।
गाय तो वैसे भी हमारी माता है, लेकिन भैंस को तो मौसी का दर्जा भी नहीं मिल पाया। धन्यभाग बिल्ली के, जो वह शेर की मौसी तो कहलाती है। आज भी रसोई में पहली रोटी गाय की ही होती है, भैंस की नहीं। कितना आदर सम्मान गाय को, उसके लिए गोशाला, और भैंस के लिए तबेला। पूर्वजों के निमित्त गऊ ग्रास और भैंस को सिर्फ घास।
कोई स्वर्गवासी, कोई परलोकवासी तो कोई गोलोकवासी और बेबस, बेचारी भैंस लेती रहती उबासी।
भैंस पर किसी को कोई यकीन नहीं, भरोसा नहीं। लो गई भैंस पानी में और जब भी भरोसा किया, भरोसे की भैंस ने हमेशा पाड़ा ही जना।
मैं अच्छी तरह से जानता हूं, भैंस की तारीफ में कितने भी कसीदे काढ़ लूं, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ना। लगता है मेरी बुद्धि ही घास चरने गई थी, जो मैं भैंस का गुणगान कर बैठा। किसी ने सच ही कहा है, भैंस के आगे बीन बजाने से क्या फायदा।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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