श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “प्रेम और विवाह…“।)
अभी अभी # ८०९ ⇒ आलेख – प्रेम और विवाह
श्री प्रदीप शर्मा
हमारे भारतीय परिवेश में प्रेम और विवाह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जहां प्रेम है, वहां विवाह जरूरी है, जहां विवाह है, वहां प्रेम जरूरी नहीं। विवाह एक संस्कार है, एक मर्यादा है, विवाह एक मर्यादित प्रेम है। प्रेम के सूत्र में धर्म का मोती पिरोकर मंगल सूत्र तैयार किया जाता है। विवाह को मंगल परिणय नाम दिया जाता है। अग्नि को साक्षी मानकर इसे एक पवित्र बंधन माना गया है, किसी राजनीतिक पार्टी का गठबंधन नहीं।
विवाह एक परंपरा है और एक समय में विवाह के कई प्रकार प्रचलन में थे और विधि और विधान द्वारा मान्य थे। आज की परिस्थिति में सिर्फ विवाह है और सिर्फ प्रेम विवाह है।।
प्रेमी प्रेमिका को कल तक सामाजिक मान्यता नहीं थी, लिव इन को तो अब वैधानिक मान्यता भी मिल चुकी है, जिसमें धर्म और नैतिकता का भले ही अभाव हो, उदात्त प्रेम संभवतः इसका आधार हो।
राधा और कृष्ण के पारलौकिक प्रेम को आध्यात्मिक और धार्मिक मान्यता तो खैर मिली ही हुई है, लेकिन यह संबंध किसी धार्मिक, और सामाजिक बंधन का मोहताज नहीं। वैष्णव जन हो अथवा एक आम भक्त, वह प्रेम से सीताराम के साथ राधेश्याम भी बोल सकता है। विवाह जरूरी है भाई, लेकिन सबसे ऊंची प्रेम सगाई।।
विवाह परंपरागत हो अथवा प्रेम, अरेंज्ड अथवा लव, इस रिश्ते में प्रेम के साथ साथ स्थायित्व भी जरूरी है। अगर शादी टिक जाती है, तो प्रेम भी रिश्ते में दबे पांव प्रवेश कर ही जाता है। एक वह भी समय था, जब माता पिता ही संतान के लिए रिश्ता ढूंढते थे और पसंद करते थे। संतान की मर्जी अथवा नाराजी कोई मायने नहीं रखती थी। परिवार फला फूला, बाल बच्चे हुए, पहले बच्चों को प्यार करते रहे, उन्हें प्यार करते करते बूढ़े हो गए। कब आपस में प्यार हो गया, पता ही नहीं चला।
प्रेम विवाह की तो बात ही अलग है। कहीं खुल्लम खुल्ला प्यार करेंगे हम दोनों, मियां बीवी राजी तो क्या करे काजी, कहीं भागकर, तो कहीं छुपकर, तो कहीं खुले आम, आम के आम गुठली के दाम, हम तो हैं आपके गुलाम। साहब और बीवी, दोनों एक दूसरे के गुलाम।।
प्यार में अगर सौदा नहीं और प्यार में अगर धोखा नहीं, तो समझिए वैवाहिक जीवन सुधर गया। अगर आप आंख मूंदकर गृहस्थी की गाड़ी खींच रहे हैं, इधर उधर ताक झांक नहीं कर रहे, कौन सुखी है और कौन सुखी, इसका हिसाब नहीं रख रहे, तो आपका खुद का गणित कभी गड़बड़ नहीं होगा। आधी छोड़ पूरी को पाने की कोशिश यहां कभी कामयाब नहीं होती। जो मिल गया, वही मुकद्दर। कभी मुकद्दर के सिकंदर तो कभी सिर्फ चर्चगेट से बोरीबंदर।
परंपरागत विवाह भले ही कराया जाता हो, ऐसे मामलों में अधिकतर, प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है। साथ रहना, प्रेम की पहली निशानी है। अच्छा खाना, इंसान की दूसरी कमजोरी है। पेट के जरिए भी प्यार हासिल किया जा सकता है। कहीं तन की सुंदरता, तो कहीं मन की सुंदरता। और धन की तो पूछिए ही मत। एक तू ही धनवान है गौरी, बाकी सब कंगाल, अगर चांदी जैसा रंग हो और सोने जैसे बाल।।
कल ही दिलीपकुमार और मनोज कुमार पर फिल्माया गया, फिल्म आदमी का एक गीत सुना, शायद तेरी, मेरी और किसी और की ही दास्तान हो, गौर फरमाइए, रफी साहब और तलत की आवाज में ;
कैसी अजीब आज
बहारों की रात है,
एक चांद आसमां में है
एक मेरे पास है।
जिसके जवाब में हमारे हताश भारत कुमार कहते हैं;
ओ देने वाले तूने तो
कोई कमी ना की,
अब किसको क्या मिला
ये मुकद्दर की बात है।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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