श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतिम साँसें।)

?अभी अभी # ८१६ ⇒ आलेख – अमर बेल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(CUSCATA)

जड़ नहीं, तना नहीं, फल, फूल, पत्ती नहीं, अमरवल्लवी लता हूं, मैं अमर बेल। हां, आत्म निर्भर नहीं, परजीवी, पैरासाइट हूं मैं, छा जाती हूं मैं पौधों पर, लेकिन औषधीय गुणों की खान हूं मैं।

हर लता, बेल नहीं होती, हर बेल अमर बेल नहीं होती।

लौकी, गिलकी, कद्दू और तो और करेले की भी बेल होती है, लेकिन ये सब अपने पांव पर खड़ी, आत्म निर्भर होती हैं। अपनी तो हींग फिटकरी भी नहीं लगती, फिर भी ठाठ हैं मुझ अमर बेल के।।

यूं ही नाम नहीं पड़ा मेरा अमर बेल, अमृत मंथन में निकली अमृत की बूंदों से उत्पत्ति के कारण ही तो मुझे अमर बेल कहा जाने लगा। आप मुझे बेर और बबूल की बांहों में उलझा देख सकते हैं। लेकिन मैं खुद नहीं उलझती, जिसका खाती हूं, उसे ही उलझा लेती हूं। वह बेचारा सूखता रहता है और मैं फलती फूलती रहती हूं।

परजीवी सिर्फ वनस्पति में ही नहीं पाए जाते, जूं, डैंड्रफ, और खटमल जैसा जीव तो ठीक, किसी का खून चूसने वाले सूदखोर, स्वार्थी, और लालची, दूसरों के टुकड़ों पर पलने वाले लोग भी इसी श्रेणी में आते हैं, जो समाज को खोखला करते रहते हैं।।

अमर बेल होते हुए भी मैं आत्मा की तरह अमर नहीं। आत्मा तो सभी तरह के बंधनों से मुक्त है लेकिन मैं तो स्वयं ही अपने आप में एक ऐसा बंधन हूं, जो जन्मदाता और आश्रयदाता को ही जकड़ लेती है, जिस थाली में खाती हूं, उसी में छेद करती हूं।

मेरी भी मुक्ति तभी संभव है, जब मेरी यह परजीवी देह, मानवता के कुछ काम आए। ईश्वर ने भी शायद मुझे गिलोय की तरह आयुर्वेदिक उपचार हेतु ही अमर रहने का वरदान दिया है। ऐसा सौभाग्य कहां हर परजीवी को नसीब होता है। बीमार दुखी और अस्वस्थ मानवों की सेवा ही मेरी अमरता का मुख्य रहस्य है।।

एक पुण्यात्मा कई जीवों के बंधनों को काट उन्हें मुक्ति के मार्ग की ओर अग्रसर करती है, इस अमर बेल की भी यही आस है, उसका जीवन भी किसी के काम आए, ताकि एक परजीवी होते हुए भी, वह अपने आश्रयदाता का कर्ज तो उतार सके। मैं अमरबेल, एक परजीवी समाजसेवी ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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