श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “लोकतंत्र चौराहे पर…“।)
अभी अभी # ८२१ ⇒ आलेख – लोकतंत्र चौराहे पर
श्री प्रदीप शर्मा
दिल के दर्द का कुछ यूं इंतजाम हुआ,पहले चाके ज़िगर हुआ,फिर जश्ने आम हुआ। इस दिल के टुकड़े जरूर हुए,लेकिन आज सुकून है,यह क्या कम है। हम आजाद भी हैं,और लोकतंत्र भी जिंदा है,बस यही हमारी सबसे बड़ी कामयाबी है।
इस लोकतंत्र पर भी कभी आपातकाल का काला साया पड़ा था, लेकिन गम के बादल छंट गए, फिर रोशनी का इज़हार हुआ।
कुछ अतीत के पन्ने पलटें,तो कभी अंग्रेजी में एक शंकर्स वीकली नाम की पत्रिका प्रकाशित होती थी,जिसकी तुलना विदेशी पत्रिका punch से आसानी से की जा सकती है। प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट के.शंकर पिल्लई द्वारा संपादित यह देश की पहली कार्टून पत्रिका थी।
शंकर्स वीकली, शंकर का सपना था जो सन् १९४८ में साकार हुआ था। ।
बहुत कम लोग जानते होंगे, इसी पत्रिका की तर्ज पर, शंकर्स वीकली का हिंदी में भी प्रकाशन हुआ था। लेकिन, खेद है, इसके कुछ ही अंक प्रकाशित हो पाए। इसी पत्रिका के एक अंक में श्रीलाल शुक्ल का एक व्यंग्य प्रकाशित हुआ था, जिसका शीर्षक था, चौराहे पर। यह अंक और यह व्यंग्य शायद आज कहीं उपलब्ध न हो,लेकिन उसकी एक पंक्ति, आज ४५ वर्ष के बाद भी मुझे अच्छी तरह से याद है।
“चारों ओर जनसंघ फैला हुआ था“।
तब और अब में कितना अंतर है। आज की भारतीय जनता पार्टी, तब जनसंघ ही तो थी। जनसंघ का साधारण अर्थ जन समूह भी होता है। अर्थ तो राग दरबारी का भी कुछ और ही होता है। बस यही खूबी है, शब्दों की और व्यंग्य के जादूगर श्रीलाल शुक्ल की ।
अब आइए,व्यंग्य के शीर्षक “चौराहे पर” की ओर मुखातिब होते हैं। तब लोकतंत्र चौराहे पर नहीं,खतरे में था। हिंदी की कई अच्छी पत्रिकाएं बंद हो गई थी, जिनमें दोनों हिंदी अंग्रेजी शंकर्स वीकली शामिल थी। धर्मयुग, दिनमान, पुराना ज्ञानोदय और सारिका का भी यही हश्र हुआ। आज सिर्फ राजनीति जिंदा है, अच्छी तरह फल फूल रही है, लोकतंत्र फिर भी चौराहे पर ही है।
जो लोग आजादी के बाद पैदा हुए हैं, वे आजादी का सपना नहीं देख सकते लेकिन मजबूत लोकतंत्र और एक साधन संपन्न व सशक्त राष्ट्र का सपना तो देख ही सकते हैं। जन्म किसी राष्ट्र का हो अथवा किसी बालक का, पीड़ा और संघर्ष तो मां को ही झेलना पड़ता है। जिसे नौ महीने अपने पेट में पाला पोसा, उस जिगर के टुकड़े को अपने से अलग करना पड़ता है,और तब ही वह एक मां कहलाती है। मां का त्याग एक बालक नहीं जान सकता। ।
आज हमारा लोकतंत्र सुरक्षित है और मजबूत है और यही हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है। आज लोकतंत्र चौराहे पर है।
चहुंमुखी विकास के रास्ते खुले हुए हैं। स्वदेशी जागरण और स्मार्ट सिटी की जुगलबंदी चल रही है। हमने मन्नू भंडारी का महाभोज भी देखा अब तो बस छप्पन भोग की तैयारी है। ।
© श्री प्रदीप शर्मा
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