श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “॥ चपरासी ॥।)

?अभी अभी # ८२९ ⇒ आलेख – ॥ चपरासी ॥ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जो कभी अंग्रेजों का अर्दली था, वह आज हमारा चपरासी बन गया। अर्दली चाहे तो कह सकता है, साला मैं तो peon प्यून बन गया। अंग्रेजों के जमाने में, साहब के दफ्तर आने के पहले हर चीज व्यवस्थित हो जाए, यह काम एक अर्दली का होता था। आप अर्दली को अंग्रेजी शब्द orderly ऑर्डरली का अपभ्रंश भी कह सकते हैं, क्योंकि orderly शब्द का अर्थ ही व्यवस्थित होता है। जो चीज़ों को व्यवस्थित रखे, वह ऑर्डरली अर्थात् अर्दली। हमारे भाषाविदों को चपरासी शब्द में भी बू आने लगी और उन्होंने राजभाषा अधिकारियों के कहने पर उसे भृत्य बना दिया। शब्दों को नृत्य करवाने से कुछ हासिल नहीं होता। चपरासी, चपरासी ही रहता है, भृत्य कहने से कृतकृत्य नहीं हो जाता।

रूतबे में चपरासी चौकीदार से कम होता है लेकिन वह किसका चपरासी है, यह उस पर निर्भर करता है। वैसे एक चपरासी और चौकीदार की कभी आपस में तुलना नहीं की जा सकती ठीक उसी तरह जैसे एक राजा और एक विद्वान की। विद्वत्वं च नृपत्वं, च नैव तुल्यं कदाचन !

लेकिन क्यों। इसलिए, क्योंकि एक चपरासी और चौकीदार में रात दिन का अंतर है। चौकीदार रात भर डंडा और सीटी बजाता है, जब कि एक चपरासी सिर्फ सुबह १० से ५ साहब का हुक्म बजाता है।।

अगर अधिकार और रुतबे की बात करें, तो चौकीदार एक चपरासी पर भारी पड़ता है। जिम्मेदारी और जवाबदारी में भी चौकीदार, चपरासी पर भारी। अधिकार भी चौकीदार के अधिक। चौकीदार एक तरह का वॉच डॉग है। अगर गोरखा हुआ, तो शाब जी, ईमानदारी की जीती जागती मूरत। आजकल यह काम सिक्योरिटी एजेंसीज करने लगी है जिससे आर्मी के एक्स – सर्विसमेन भी आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। एक स्वयंभू चौकीदार के भरोसे इस देश के १३० करोड़ वासी आज भी चैन की नींद सो रहे हैं।

चपरासी अधिकतर शासकीय होता है। सरकारी दफ्तर और शासकीय अथवा प्राइवेट स्कूल और कॉलेज बिना चपरासी के नहीं चल सकते। स्कूल और कॉलेज का चपरासी क्लास के पीरियड और छुट्टी की सूचना अगर घंटी बजाकर दिया करता है तो एक चपरासी को साहब की घंटी सुनकर साहब के ऑफिस में प्रवेश करना पड़ता है।।

चौकीदार सलाम बजाता है जब कि सरकारी चपरासी को लोग सलाम बजाते हैं। साहब तो आते जाते रहते हैं, पक्की नौकरी तो चपरासी ही करता है। कुछ चपरासी तो साहब के इतने मुंह लगे होते हैं कि जब साहब लदते है तो चपरासी भी दहेज की तरह साथ जाता है। यह रिश्ता नमक के रिश्ते से ज़्यादा मज़बूत होता है।

साहब का मिज़ाज, कमजोरी, खासियत, मूड और पसंद नापसंद की पूरी जानकारी एक चपरासी को रहती है। साहब की अटैची का वज़न तक चपरासी उठाता है। कहीं कहीं तो ऐसा लगता है, दफ्तर का सारा बोझ ही चपरासी पर है। जिस रोज चपरासी छुट्टी पर रहता है, साहब का मूड भी ऑफ रहता है।।

अष्ट छाप के कवि भक्त सूरदास काग के भाग की सराहना करते हैं, जो उनके इष्ट हरि अर्थात बाल गोपाल श्रीकृष्ण के हाथ से माखन रोटी छीनकर ले जाता है। लेकिन एक साहब के चपरासी का भाग्य देखिए, वह कुछ छीनता नहीं, उसे सब कुछ अपने भाग्य और साहब के पुरुषार्थ से मिलता जाता है। मंदिर के भगवान से अगर मिलना है तो दान दक्षिणा का अधिकार पुजारी का होता है। साहब तक सीधा तो भगवान भी नहीं पहुंच पाता। पहले चपरासी से अपोइंटमेंट लेना पड़ता है। चपरासी, अपने भाग्य को सराहता है ! मेरा साहब की कृपा से, सब काम हो रहा है।

साहब और चपरासी का साथ सुख और दुख दोनों का होता है। जब साहब के यहां छापा पड़ता है तो चपरासी की भी बांंयी आंख फड़कने लगती है। साले सालियों के साथ बेचारे चपरासी के नाम भी दो चार मकान निकल आते हैं। वह बेचारा दार्शनिक अंदाज में, इतना ही कह पाता है, क्या करें साहब, गेहूं के साथ कभी कभी घुन भी पिस ही जाता है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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