श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अवतार…“।)
अभी अभी # ८५० ⇒ आलेख – अवतार
श्री प्रदीप शर्मा
बहुत पहले आकाशवाणी पर एक भजन सुना था, जिसके बोल कुछ इस प्रकार थे ;
पतितों को उबारा है तुमने
भक्तों को उबारो तो जानें।
हम भूल गए, भगवन तुमको
पर तुम न भुलाओ, तो जानें।।
उबारना, मतलब तारना! जिसका जन्म ही किसी को तारने के लिए हुआ हो, वह अवतार। आप इसे, अब तार, भी कह सकते हैं। लेकिन अब अवतार नहीं होते इसलिए पतितों को कोई तार नहीं रहा है। क्या पतितों को मारा नहीं जा सकता। ऐसा प्रतीत होता है, जिन पतितों को पहले कभी अवतारों ने तारा भी होगा, वे तैर कर इस भव सागर में वापस आ गए। अब हमें तारो, नहीं तो मारो।
अवतार का एक अर्थ और होता है, जो अवतरित हुआ, वह अवतार! जन्म तो खैर अवतारों का भी होता है लेकिन उन्हें प्रकट होना कहते है। भए प्रगट कृपाला, दीनदयाला कौशल्या हितकारी। उनकी तिथि मनाई जाती है, तारीख नहीं, राम नवमी। अवतार जो करते हैं, वह उनकी लीला होती है। कृष्ण जन्माष्टमी। वसु देवकी की आठवीं संतान अष्टमी को कंस के कारागृह में पैदा हुई। अवतारों का निर्वाण दिवस अथवा पुण्यतिथि नहीं मनाई जाती। जो अवतरित होते हैं, वे कालांतर में अपनी लीला समेट लेते हैं। आम और खास मानव शरीर धारी महान आत्माओं, विभूतियों में, सबके जन्म दिवस और पुण्य तिथि दोनों मनाई जाती है।।
पापी, दुष्ट और अधम में आसुरी शक्ति होती है, इसलिए वह सज्जनों की तुलना में अधिक शक्तिशाली होता है। जब साधु और शैतान का संतुलन गड़बड़ा जाता है, शैतान, साधु पर भारी पड़ने लगता है, तब संतों की रक्षा के लिए, ईश्वर को स्वयं अवतार लेना पड़ता है। केवल भक्ति से भी भगवान नहीं मिलते, शत्रुता से भी इश्वर को प्राप्त किया जा सकता है, क्योंकि उसके बारे में सुना है, वह दुष्टों को भी मारता नहीं, तारता है।
एक ओर राम नाम की लूट मची है, भक्त राम राम भजते, राम में समा रहे हैं, तो दूसरी ओर दैत्यों और असुरों की लाइन लगी है। हम पापी, अपराधी, अधम, नीच है, हमें भी मारो, सुना है आपके हाथों से मरने पर मुक्ति मिलती है। आप मारते नहीं, तारते हो। मुक्ति पाने का आसान रास्ता। गंगा में डुबकी, सभी पापों से मुक्ति। कुंभ में स्नान, अमृत कुंड में स्नान। दान – पुण्य से स्वर्ग की प्राप्ति, कठिन तपस्या से मनचाहे वर की प्राप्ति। खोने को कुछ नहीं। कोई खाली हाथ नहीं जाता। वह दाता, हम भिखारी।। हम पतित, तुम पतित पावन!
पतितों का तो उद्धार करते हो, और हम भक्तों को कायदे कानून सिखाते हो। गरुड़ पुराण से धौंस जमाते हो। नर्क, दोजख और जहन्नुम का डर और स्वर्ग, जन्नत और वैकुंठ का लालच। करुणा निधान का दण्ड विधान भी क्या कोई बुद्धिमान समझ पाया है।
वह भगवान है, सभी ऐश्वर्यों का स्वामी! वो जिस पर मेहरबान, वो पहलवान। कार्तिक मास कथाओं का, दान पुण्य और स्वयं के कल्याण का मास होता है।
घर बैठे, टीवी पर भागवत आई, तो हमने भी बहती गंगा में हाथ धो लिए। आरती चल रही है भागवत जी की। भागवत भगवान की है आरती। पापियों को पाप से है तारती। घर में जगदीश जी की आरती भी देखिए। मैं मूरख खल कामी, पाप हरो देवा। मैं समझदार, बुद्धिमान, पढ़ा लिखा आदमी कहां जाऊं? Go to hell. भगवान हैं हम, सुप्रीम कोर्ट के भी बाप। हमारा न्याय, ईश्वर का न्याय है। कोई अजामिल अपने पुत्र का नाम नारायण रख ले, और प्राण त्यागते वक्त उसे पुकारे, तो हम स्वयं चले आते हैं। आ जाते है राम, कोई बुला के देख ले।।
अच्छा है, अब अवतार नहीं होते। अपनी करनी का फल यहीं भोगो। कर लो कितने भी छल कपट, आपकी कॉन्फिडेंशियल फाइल ऊपर तैयार हो रही है। वहां कोई सोर्स अथवा रिश्वत काम नहीं आती। कर लो, जितना दान पुण्य का पाखंड करना है, जैसा करा है, वैसा ही भरना भी होगा।
आज के लोकतंत्र के अवतार संतों को तारने और दुष्टों को मारने आए हैं। काला हिट, जहरीला flit और कानून का शिकंजा ही काफी है इन इंसानियत के दुश्मन नीच, जहरीले कीड़े मकोड़े, सपोलों और बिच्छुओं के लिए। हे भगवान! हमारी भी सुन ले। दुष्टों को तार मत, उनको तो तू मार ही दे। कहीं ये रक्तबीज, अथवा भस्मासुर आगे चलकर, पुन: कोरोना बनकर मानवता को ही नष्ट ना कर दें।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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